Tuesday, 13 October 2015

आँखों पर कई लोगों ने कई तरीकों से लिखा है। स्वय रामानंद सागर की फिल्म आँखें में साहिर का खुद का लिखा शीर्षक गीत भला कौन भूल सकता है। मगर मुझे हर बार सरल शब्दों में सन1971 में आई फिल्म 'धनवान' में साहिर का लिखा यह गीत हमेशा अच्छा लगा है। आप भी आनंद लें--
'मुहब्बत में जुबां चुप हो तो आँखें बात करतीं हैं...
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ये आँखें देख कर हम,
सारी दुनिया भूल जाते हैं
इन्हें पाने की धुन में ,
हर तमन्ना भूल जाते हैं
तुम अपनी महकी-महकी,
ज़ुल्फ़ के पेचों को कम कर दो
मुसाफ़िर इनमें गिरकर,
अपना रस्ता भूल जाते हैं
ये बाहें जब हमें अपनी,
पनाहों में बुलाती हैं
हमें अपनी क़सम हम,
हर सहारा भूल जाते हैं
तुम्हारे नर्म-ओ-नाज़ुक होंठ,
जिस दम मुस्कराते हैं
बहारें झेंपती हैं,
फूल खिलना भूल जाते हैं
बहुत कुछ तुम से कहने की,
तमन्ना दिल में रखते हैं
मगर जब सामने आते हैं,
कहना भूल जाते हैं
मुहब्बत में ज़ुबां चुप हो तो,
आँखें बात करतीं हैं
वो कह देती हैं सब बातें,
जो कहना भूल जाते हैं
गुरुदत्त के सहायक रहे अबरार अल्वी ने अपने और गुरुदत्त के साथ को याद करते हुए जो बताया उस पर अँग्रेजी में एक पुस्तक प्रकाशित हुई है और उसका हिंदी अनुवाद राजपाल प्रकाशन दिल्ली ने छापा है। पिछले दिनों जब दुनिया की सार्वकालिक फिल्मों में "प्यासा" के होने की बात आई। तो मैंने उन सजीव संस्मरणों को पढ़ा। आज गुरुदत्त की पुण्यतिथि है। लीजिए प्यासा का साहिर का लिखा यह सार्वकालिक गीत पढ़िए और सोचिए कहाँ गए वे लोग --
ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया
ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनिया
ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
हर एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी
निगाहो में उलझन, दिलों में उदासी
ये दुनिया है या आलम-ए-बदहवासी
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
जहाँ एक खिलौना है, इंसान की हस्ती
ये बस्ती है मुर्दा परस्तों की बस्ती
यहाँ पर तो जीवन से मौत सस्ती
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
जवानी भटकती है बदकार बन कर
जवां जिस्म सजते हैं बाजार बनकर
यहाँ प्यार होता है व्योपार बनकर
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
"मुहब्बतों में है दोनों का एक ही मतलब,
अदा से न कहो या मुस्कुरा के हाँ कह दो"
सन 1980 में रिलीज हुई सामाजिक मुद्दो पर बनी बी. आर. चोपड़ा की बेहद मकबूल हुई फिल्म "इंसाफ का तराजू" में साहिर का सदाबहार दोगाना---
हज़ार ख्वाब हकीकत का रूप ले लेंगे
मगर ये शर्त है के तुम मुस्कुरा के हाँ कह दो ।
मुहब्बतों में है दोनों का एक ही मतलब
अदा से न कहो या मुस्कुरा के हाँ कह दो ।
हज़ार ख्वाब बहारों के और सितारों के
तुम्हारे साथ मेरी जिंदगी में आये हैं,
तुम्हारी बाहों के झूले में झूलने के लिए
मचल-मचल के मेरे अंग गुनगुनाये हैं ।
ये सारे शौक, सारे शौक, सदाक़त का रूप ले लेंगे
मगर ये शर्त है के तुम मुस्कुरा के हाँ कह दो ।
भरेगी मांग तुम्हारी वो दिन भी क्या होगा
सजेगी सेज हवाओं की सांस महकेगी
तुम अपने हाथों से सरकाओगे मेरा आँचल
अजब आग मेरे तन बदन में दहकेगी
ये सारे शौक, सारे शौक, सदाक़त का रूप ले लेंगे
मगर ये शर्त है के तुम मुस्कुरा के हाँ कह दो ।
मैं अपनी जुल्फों के साये बिछाऊंगी तुम पर
मैं तुमपे अपनी जवान धड़कने लुटाऊंगा
मैं सुबह तुमको जगाऊंगी लब पे लब रखकर
मैं तुमको भींच के कुछ और पास लाऊंगा
ये सारे शौक, सारे शौक, सदाक़त का रूप ले लेंगे
मगर ये शर्त है के तुम मुस्कुरा के हाँ कह दो ।
मुहब्बतों में है दोनों का एक ही मतलब
अदा से न कहो या मुस्कुरा के हाँ कह दो
हज़ार ख्वाब हकीकत का रूप ले लेंगे ।