Tuesday, 13 October 2015

गुरुदत्त के सहायक रहे अबरार अल्वी ने अपने और गुरुदत्त के साथ को याद करते हुए जो बताया उस पर अँग्रेजी में एक पुस्तक प्रकाशित हुई है और उसका हिंदी अनुवाद राजपाल प्रकाशन दिल्ली ने छापा है। पिछले दिनों जब दुनिया की सार्वकालिक फिल्मों में "प्यासा" के होने की बात आई। तो मैंने उन सजीव संस्मरणों को पढ़ा। आज गुरुदत्त की पुण्यतिथि है। लीजिए प्यासा का साहिर का लिखा यह सार्वकालिक गीत पढ़िए और सोचिए कहाँ गए वे लोग --
ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया
ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनिया
ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
हर एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी
निगाहो में उलझन, दिलों में उदासी
ये दुनिया है या आलम-ए-बदहवासी
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
जहाँ एक खिलौना है, इंसान की हस्ती
ये बस्ती है मुर्दा परस्तों की बस्ती
यहाँ पर तो जीवन से मौत सस्ती
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
जवानी भटकती है बदकार बन कर
जवां जिस्म सजते हैं बाजार बनकर
यहाँ प्यार होता है व्योपार बनकर
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

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