Tuesday, 4 August 2015



ये दुनियाँ दोरंगी है---
एक तरफ से रेशम ओढ़े,
एक तरफ से नंगी है,

एक तरफ अंधी दौलत की,
पागल ऐश परस्ती है,
एक तरफ जिस्मों की कीमत
रोटी से भी सस्ती है,

एक तरफ है सोनागाछी,
एक तरफ चौरंगी है,
ये दुनिया दोरंगी है,


खुदाऐ बरतर तेरी जमीं पर, जमीं की खातिर ये जंग क्यों है,
हर एक फतह-ओ-ज़फर के दामन पे,खूने-इंसा का रंग क्यों है,

जमीं भी तेरी है, हम भी तेरे ये मिल्कियत का सवाल क्यों है,
ये कत्लो -खूँ का रिवाज़ क्यों है,ये रस्से जंग-ओ-जवाल क्यों है,

जिन्हें तलब है जहान भर की,उन्हीं का दिल इतना तंग क्यों है,

ग़रीब माँओं शरीफ बहनों को अम्नो-इज़्जत की जिन्दगी दे,
जिन्हें अता की है तूने ताकत,उन्हें हिदायत की ऱोशनी दे,

सरों में कब्रो-गुरूर क्यों है,दिलों के शीशों पे जंग क्यों है,

कज़ा के रस्ते पे जाने वालों,को बच के आने की राह देना,
दिलों के गुलशन उजड़ न जाएं,मुहब्बतों को पनाह देना,

जहाँ में अपने वफा के बदले,ये जश्ने तीरो तफंग क्यों है,


यह देश है वीर जवानों का,अलबेलों का मस्तानों का,
इस देश का यारो क्या कहना,यह देश है दुनिया का गहना,

यहाँ चौड़ी छाती वीरों की,यहाँ भोली शक्लें हीरों की,
यहाँ गाते हैं राँझे मस्ती में,मचती हैं धूमें बस्ती में,

पेडों पे बहारें झूलों की,राहों में कतारें फूलों की,
यहाँ हँसता है सावन बालों में,खिलती हैं कलियाँ गालों में,

कहीं दंगल शोख जवानों के,कहीं करतब तीर कमानों के,
यहाँ नित-नित मेले सजते हैं,नित ढ़ोल और तासे बजते हैं,

दिलवर के लिए दिलदार हैं हम,दुश्मन के लिए तलवार हैं हम,
मैदाँ में अगर हम डट जाएँ, मुश्किल है कि पीछे हट जाएँ,

यह देश है वीर जवानों का,अलबेलों का मस्तानों का,
इस देश का यारो क्या कहना,यह देश है दुनिया का गहना,

प्यार कर लिया तो क्या,प्यार है ख़ता नहीं,
तेरी मेरी उम्र में,  किसने ये किया नही,

तेरे होंठ मेरे होंठ मिल गए तो क्या हुआ,
दिल की तरह जिस्म भी खिल गए तो क्या हुआ,

इससे पहले ये सितम,क्या कभी हुआ नहीं,
प्यार कर लिया तो क्या,प्यार है ख़ता नहीं,

तू भी होशमन्द है,मैं भी होश मन्द हूँ,
उस तरह जिंएगे हम जिस तरह पसंद है,

उनकी बात क्या सुनें जिनसे वास्ता नहीं,
प्यार कर लिया तो क्या,प्यार है ख़ता नहीं,

रस्म क्या रिवाज़ क्या,धर्म क्या समाज क्या,?
दुश्मनों का खौफ क्यों,दोस्तों की लाज क्या ?

ये वो शौक़ है कि जिससे कोई भी बचा नहीं,
प्यार कर लिया तो क्या,प्यार है ख़ता नहीं,


                      ( सुन्दर रात्रिगीत)

फैली हुई हैं सपनों की बाहें, आजा चल दें कहीं दूर,
वही मेरी मंज़िल वही तेरी राहें,आजा चल दें कहीं दूर,

ऊदी घटा के साए तले छिप जाएँ,धुँधली फिज़ा में,कुछ खोएँ,कुछ पाएँ-2
साँसों की लय पर,कोई ऐसी धुन गाएँ,दे दे जो दिल को दिल की पनाहें,
आजा चल दें कहीं दूर,
फैली हुई हैं सपनों की बाहें आजा चल दें कहीं दूर,
वही मेरी मंज़िल वही तेरी राहें,आजा चल दें कहीं दूर,

झूला धनक का ,धीरे-धीरे हम झूलें,अंबर तो क्या है तारों के भी लब छूलें,-2
मस्ती में झूमें,और कभी हम घूमें,देखें न पीछे मुड़के निगाहें,
आजा चल दें कहीं दूर,

फैली हुई हैं सपनों की बाहें, आजा चल दें कहीं दूर,
वही मेरी मंज़िल वही तेरी राहें,आजा चल दें कहीं दूर,
मेरे भइया मेरे चन्दा मेरे अनमोल रतन,
तेरे बदले में जमाने की कोई चीज न लूँ,

तेरी साँसों की कसम खा के हवा चलती है,
तेरे चेहरे की झलक पा के बहार आती है,

एक पल भी मेरी नज़रों से जो तू ओझल हो,
हर तरफ मेरी नज़र तुझको पुकार आती है,

मेरे भइया मेरे चन्दा मेरे....

तेरे चेहरे की महकती हुई लडियों के लिए,
अनगिनत फूल उम्मीदों के चुने हैं मैने,

वो भी दिन आये कि इन ख्वाबों को ताबीर मिले,
तेरी खातिर जो हसीं ख्वाब बुने हैं मैंने,

मेरे भइया मेरे चंदा मेरे अनमोल रतन,
तेरे बदले में जमाने की कोई चीज न लूँ,


ये वतन तेरी मेरी नस्ल की जागीर नहीं,
सैकड़ों नस्लों की मेहनत ने संवारा है इसे,

..पटरियां रेल की, सडकों की बसें, फोन के तार,
तेरी और मेरी खताओं की सजा क्यों भुगतें,

उनपे क्यों जुल्म हो जिनकी कोई तकसीर नहीं,
ये वतन तेरी मेरी नस्ल की जागीर नहीं,

सैकडों नस्लों की मेहनत ने सँवारा है इसे,
साहिर
सन १९५७ में रिलीज़ हुई थी मुंबई के मिनर्वा थिएटर में गुरुदत्त की 'प्यासा'। 
व्यवस्था और सत्ता, समाज के अलमदारों और ठेकेदारों, नेताओं और अफ़सरशाही पर ज़बरदस्त सीधा प्रहार और तंज़ कसती थी ये फ़िल्म। 
इसमें साहिर का एक गाना था - जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं.…
जब ये गाना स्क्रीन पर प्ले हुआ तो सारे दर्शक उठ कर खड़े हो गए। उन्होंने खूब तालियां बजाईं और जम कर 'वन्समोर' के नारे लगाये।
सिनेमा हाल के प्रबंधक परेशान कि क्या करें। आख़िरकार दर्शकों के बेतरह शोर-गुल और मांग के दबाव में उन्हें यह गाना दुबारा प्ले करना पड़ा। इतने पर भी दर्शकों का दिल नहीं भरा। तीसरी बार प्ले करना पड़ा।
याद नहीं पड़ता कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसी घटना पहले और बाद में कभी हुई हो।
'प्यासा' की गिनती सदी की पांच श्रेष्ठ फिल्मों में होती है। सुना है इस गाने को सुन कर शीर्ष नेताओं में बहुत खलबली मची थी। इसे प्रतिबंधित किये जाने की मांग भी हुई। लेकिन अंततः सच्चाई को स्वीकार कर लिया गया।
पेश है गाना -
ये कूचे, ये नीलामघर दिलकशी के
ये लुटते हए कारवां ज़िंदगी के
कहां हैं, कहां हैं मुहाफ़िज़ खुदी के
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं.…
ये पुरपेच गलियां, ये बदनाम बाज़ार
ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झंकार
ये इस्मत के सौदे, ये सौदों पर तकरार
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं.…
ये सदियों से बेख्वाब, सहमी सी गलियां
ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियां
ये बिकती हुई खोखली रंग-रलियाँ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं.…
ये उजले दरीचों में पायल की छन छन
थकी-हारी सांसों पे तबले की धन धन
ये बेरहम कमरों में खांसी की ठन ठन
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं.…
ये फूलों के गज़रे, ये पीकों के छींटे
ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख़ फ़िकरे
ये ढलके बदन, ये बीमार चेहरे
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं.…
यहां पीर भी आ चुके, जवां भी
तनोमंद बेटे भी, अब्बा, मियां भी
ये बीवी भी है, और बहन भी है, मां भी
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं.…
मदद चाहती है, ये हव्वा की बेटी
यशोदा की हमजिंस, राधा की बेटी
पयंबर की उम्मत, जुलय खां की बेटी
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं.…
ज़रा मुल्क के रहबरों को बुलाओ
ये कूचे, ये गलियां, ये मंज़र दिखाओ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे उनको लाओ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं.… 


'क' से कुल दुनिया हमारी,
जिसमें भारत देश है,
'ख' से खेती जिसमें ,
जीवन दान का संदेश है,
'ग' से गंगा सबसे पहले,
आर्य उतरे थे जहाँ,
'घ' से घर की आबरू,
रक्षक हैं जिसके नौजवां,
'च' से राजा चंद्रगुप्त औ,
'छ' से उसका छत्र है,
देश के इतिहास का,
वह युग सुनहरा पत्र है,
'क' से कुल दुनिया हमारी,
जिसमें भारत देश है,
'ख' से खेती जिसमें ,
जीवन दान का संदेश है,...
साहिर
फिल्म - चाँदी की दीवार