Tuesday, 4 August 2015



खुदाऐ बरतर तेरी जमीं पर, जमीं की खातिर ये जंग क्यों है,
हर एक फतह-ओ-ज़फर के दामन पे,खूने-इंसा का रंग क्यों है,

जमीं भी तेरी है, हम भी तेरे ये मिल्कियत का सवाल क्यों है,
ये कत्लो -खूँ का रिवाज़ क्यों है,ये रस्से जंग-ओ-जवाल क्यों है,

जिन्हें तलब है जहान भर की,उन्हीं का दिल इतना तंग क्यों है,

ग़रीब माँओं शरीफ बहनों को अम्नो-इज़्जत की जिन्दगी दे,
जिन्हें अता की है तूने ताकत,उन्हें हिदायत की ऱोशनी दे,

सरों में कब्रो-गुरूर क्यों है,दिलों के शीशों पे जंग क्यों है,

कज़ा के रस्ते पे जाने वालों,को बच के आने की राह देना,
दिलों के गुलशन उजड़ न जाएं,मुहब्बतों को पनाह देना,

जहाँ में अपने वफा के बदले,ये जश्ने तीरो तफंग क्यों है,

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