Saturday, 26 September 2015

कनउजी में एक कहावत है--
'काजर तौ सब कोई लगाय लेत,
चितउन की भाँत होत' 
अर्थात काजल लगाना तो सबको आता है मगर कजरारी आँखों से देखा कैसे जाए वो तरीक़ा वो भांत सबको नहीं पता।
आज जो गीत हम आपको पढवाने जा रहे है यह भगवती बाबू के उपन्यास 'चित्रलेखा' पर 1964 में बनी थी।
जो बात इतने बड़े उपन्यास में कही गयी थी वह मात्र कुछ पंक्तियों में समाहित कर दी।
कठिन दार्शनिक तथ्यों को सरल सहज शब्दों में कह देना उनकी विशेषता थी।
यह दर्शन कुछ अन्य गीतों में भी प्रकट हु
संसार से भागे फिरते हो
(चित्रलेखा - 1964)
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संसार से भागे फिरते हो,
भगवान को तुम क्या पाओगे
इस लोक को भी अपना न सके,
उस लोक में भी पछताओगे .
ये पाप है क्या, ये पुण्य है क्या,
रीतों पे धरम की मुहरें हैं
हर युग में बदलते धर्मों को
कैसे आदर्श बनाओगे
ये भोग भी एक तपस्या है,
तुम त्याग के मारे क्या जानो
अपमान रचयिता का होगा,
रचना को अगर ठुकराओगे
हम कहते हैं ये जग अपना है,
तुम कहते हो झूठा सपना है
हम जन्म बिता कर जायेंगे,
तुम जन्म गंवा कर जाओगे
[Composer : Roshan; Singer : Lata Mangeshkar; Producer : Pusha Picture ; Director: Kidar Nath Sharma; Actor : Meena Kumari]

केदार शर्मा ने सन 1941 में भी चित्रलेखा फिल्म बनाई थी | उसमें एक गीत था- तुम जाओ जाओ भगवान बने | इसके बोल नीचे दिए गए हैं । सन 1964 में बनी चित्रलेखा के लिए साहिर ने इसी सिचुऐशन पर “संसार से भागे फिरते हो” गीत लिखा |
तुम जाओ जाओ भगवान बने
इंसान बनो तो जाने |
तुम उनके जो तुमको ध्यायें
जो नाम रटें मुक्ति पायें
हम पाप करें और दूर रहें
तुम प्यार करें तो माने
तुम जाओ जाओ भगवान बने
इंसान बनो तो जाने |
परिवार और स्कूल के बच्चों के साथ देश के सुदूर पर्वतीय स्थलों को नजदीक से देखने का अवसर एक नहीं कई - कई बार मिला। करीब से प्रकृति के रंगों को देखते हुए हर बार ज़ेहन में जिस गीत ने अपना घर बनाया और मुझे गुनगुनाने को मजबूर कर दिया उनमें यह गीत सबसे आगे है। कई बार लगा अरे यह तो मेरे ही दिल की आवाज़ है। ऐसे अविस्मरणीय दृश्य जिन्हें देख मन से बेसाख्ता फूट पडा -- क्यों न जज़्ब हो जाएं...
क्योंकि प्रकृति ही तो ईश्वर का प्रकट रूप है।
लीजिए आप भी खो जाइए शब्दों के इस जादूगर के इस जादू में...
परवतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है
सुरमई उजाला है, चम्पई अंधेरा है ।
दोनों वक़्त मिलते हैं दो दिलों की सूरत से
आसमां ने खुश हो के, रँग सा बिखेरा है ।
ठहरे-ठहरे पानी में, गीत सरसराते हैं
भीगे-भीगे झोंकों में खुशबुओं का डेरा है ।
क्यों न जज़्ब हो जाएं, इस हसीं नज़ारे में
रोशनी का झुरमट है, मस्तियों का घेरा है ।
अब किसी नज़ारे की, दिल को आरज़ू क्यों है
जब से पा लिया तुमको, सब जहान मेरा है ।
साहिर (शगुन -1964)
हमारे देश में बेटी की विदाई एक पिता के लिए क्या है यह एक पिता होकर बेहतर समझा जा सकता है। 'नीलकमल' फिल्म के लिए लिखे साहिर के इस गीत में एक पिता का दर्द ही नहीं देश की आत्मा की पुकार समायी हुई है।
आश्चर्य की बात है कि साहिर आजीवन अविवाहित रहे और फिर चाहे 'कभी कभी' फिल्म के लिए लिखा 'मेरे घर आई एक नन्हीं परी' जैसा अनमोल गीत हो या ये सदाबहार विदाई गीत... उनके कलम के जादू के ही कमाल हैं।
'होठों पे हँसी की धूप खिले,
माथे पे खुशी का ताज रहे,
और ...
'उस द्वार से भी दुख दूर रहे जिस द्वार से तेरा द्वार मिले'
हमारी सर्वे भवन्तु सुखिन: का ही लघु रूप तो है।
आइए पढ़ते सुनते और देखते हैं यह गीत---
बाबुल की दुआएं लेती जा,
जा तुझको सुखी संसार मिले,
मैके की कभी ना याद आए,
ससुराल में इतना प्यार मिले,
नाज़ों से तुझे पाला मैंने,
कलियों की तरह फूलों की तरह,
बचपन में झुलाया है तुझको,
बाहों ने मेरी झूलों की तरह,
मेरे बाग की अय नाजुक डाली,
तुझे हर पल नई बहार मिले,
जिस घर से बंधे हैं भाग तेरे,
उस घर में सदा तेरा राज रहे,
होठों पे हँसी की धूप खिले,
माथे पे खुशी का ताज रहे,
कभी जिसकी जोत न हो फीकी,
तुझे ऐसा रूप सिंगार मिले,
बीतें तेरे जीवन की घडियाँ,
आराम की ठंडी छाँव में,
काँटा भी न चुभने पाय कभी,
मेरी लाड़ली तेरे पाँव में,
उस द्वार से भी दुख दूर रहे,
जिस द्वार से तेरा द्वार मिले,
प्रसिद्ध संगीत निर्देशक जयदेव का शौक था उन्हें जब भी समय मिलता वे साहित्यकारों की लोकप्रिय रचनाओं की धुन बनाते थे।इसी क्रम में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज आनंदनारायण मुल्ला जो शायर भी थे उनकी एक ग़ज़ल की धुन उन्होंने बनाई।
ग़ज़ल का शेर था -
वो रफ्ता रफ्ता जाम पिलाते चले गए,
मैं रफ्ता रफ्ता होश में आता चला गया,
उन दिनों देवानंद 'हम दोनों' फिल्म बना रहे थे जिसका संगीत जयदेव साहब बना रहे थे। देवानंद के आने पर जब जयदेव ने उन्हें वह धुन सुनाई जो उन्हें बहुत अच्छी लगी। 'हम दोनों' के गीत साहिर लिख रहे थे। उन दोनों को पता था कि साहिर धुन पर गीत लिखने के सख्त खिलाफ थे। उनका मानना था कि प्राथमिक गीत है धुन बाद में । मगर फिर भी उन्होंने साहिर को वह धुन सुनाई और दोस्ती का वास्ता देकर इसरार किया कि वे इस पर एक गीत लिखें।
दोस्ती की खातिर अपने उसूलों को तोड़कर साहिर ने जो गीत लिखा। क्या कभी वह आपकी जुबान पर नहीं आया ?
मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया,
हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया,
बरबादियों का शोक मनाना फिज़ूल था,
बरबादियो का जश्न मनाता चला गया,
जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया,
जो खो गया मैं उसको भुलाता चला गया,
ग़म और खुशी में फर्क न महसूस हो जहाँ,
मैं दिल को उस मकाम पे लाता चला गया,

Saturday, 19 September 2015

ठण्डी हवाएं लहरा के आएं
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किसी भी क्षेत्र में नए प्रयोगों के लिए लोग आसानी से तैयार नहीं होते हैं। यही कारण था कि उन दिनों फिल्मी गीत भी उसी परंपरागत ढर्रे पर लिखे जा रहे थे।
'ओ जानेवाले बालमवा लौट के आ लौट के आ, जा मैं ना तेरा बालमवा बेवफा बेवफा'
ऐसे में सन 1951 में 'नौजवान' फिल्म के जरिए साहिर ने ठण्डी हवा के शीतल झोंके की तरह फिल्मी गीतों की दुनियाँ में प्रवेश किया । इससे आगे का सफर स्वर्णिम इतिहास का वह दौर है जिसे भुलाया जाना असंभव है। आइए पढ़ते हैं उनका वही गीत ---
ठण्डी हवाएं, लहरा के आएं
रुत है जवां, उनको यहाँ, कैसे बुलाएं
ठण्डी हवाएं ...
चाँद और तारे, हँसते नज़ारे
मिलके सभी, दिल में सखी, जादू जगायें
ठण्डी हवाएं ...
कहा भी ना जाये, रहा भी ना जाये
तुमसे अगर, मिले भी नज़र, हम झेंप जाएं
ठण्डी हवाएं ...
दिल के फ़साने, दिल ही ना जाने
तुमको सजन, दिल की लगन, कैसे बतायें
ठण्डी हवाएं ...
(नौजवान -1951)
गंगा तेरा पानी अमृत...
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वर्षों पुरानी बात है जब मैं पहली बार हरिद्वार गया था। उसी दौरान मंसा देवी के मंदिर के ऊपरी गुंबद पर बंधे लाउड स्पीकर से जब मैंने इस गीत को सुना और इसके शब्दों पर ध्यान दिया। तो लगा सचमुच साहिर मतलब जादूगर
मुझे तो इतनी सुंदर सहज गंगा की स्तुति नहीं मिली। आप भी देखें ---
दूर हिमालय से तू आई गीत सुहाने गाती,
बस्ती बस्ती जंगल जंगल सुख संदेश सुनाती,
तेरी चाँदी जैसी धारा, मीलों तक लहराए,
गंगा तेरा पानी अमृत, झर झर बहता जाए,
युग युग से इस देश की धरती,
तुझसे जीवन पाए,
कितने सूरज डूबे उभरे गंगा तेरे द्वारे,
युगों युगों की कथा सुनाएं तेरे बहते धारे,
तुझको छोड़ के भारत का,
इतिहास लिखा न जाए,
गंगा तेरा पानी अमृत,
इस धरती का दुख सुख तूने,
अपने बीच समोया,
जब जब देश गुलाम हुआ है,
तेरा पानी रोया,
जब जब हम आज़ाद हुए है,
तेरे तट मुसकाए,
गंगा तेरा पानी अमृत झर झर बहता जाए,
युग युग से इस देश की धरती,
तुझसे जीवन पाए,
कल का हिंदुस्तान जमाना देखेगा
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सदियों की गुलामी के बाद देश में आजादी आई। संसाधनविहीन देश डगमगाते पैरों से उठ खड़े होने की कोशिश में लग गया। आजादी के साथ ही उसने विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा का ह्रदयविदारक दौर झेला।समस्याओं की एक अटूट सृंखला चलती चली जा रही थी। गाँधी और नेहरू की मृत्यु के बाद तो देश अनाथ सा हो गया था। ऐसे में पाकिस्तान का आक्रमण और अन्न की कमी के कारण प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को जहाँ "जय जवान" के साथ "जय किसान" का नारा ही देश को नहीं देना पड़ा। बल्कि देशवासियों से व्रत रखने की अपील भी करनी पड़ी। अमेरिका ने हमारे खाने के लिए बेकार सा गेहूँ भिजवाया। बड़ी कठिन परिस्थितियाँ थीं देश के आगे... वह आगे कैसे बढ़ता।
उसे चाहिए था कुछ सहारे कुछ सपने...जिन्हें आँखों में लिए वह दुनियाँ के देशों से होड़ करता हुआ अग्रिम कतार में खड़ा हो सके।
तभी एक फिल्म आई। नाम था "आदमी और इंसान" सारे देश को आँखों में सपना और बाजुओं में हिम्मत लिए एक जोशीला गीत सुनाई पड़ा।
चमकेगा देश हमारा मेरे साथी रे
आँखों में कल का नज़ारा मेरे साथी रे
भरे हुए खलिहान जमाना देखेगा
कल का हिंदुस्तान जमाना देखेगा,
हरित क्रांति श्वेत क्रांति का दौर चला और आज जब सैकड़ों टन अनाज रख रखाव के अभाव में सड़ जाने की खबरें आतीं हैं तो सहसा यक़ीन नहीं आता कि साहिर जादूगर ही थे या नजूमी यानी ज्योतिषी भी। आइए पूरा गीत पढ़ते हैं और प्रयास करते हैं कि बाकी के सपने कैसे पूरे किए जाएं।
जागेगा इंसान जमाना देखेगा
उट्ठेगा तूफान जमाना देखेगा,
बहता चलेगा मीलों नहरों का पानी,
झूमेगी खेती जैसे झूमें जवानी,
चमकेगा देश हमारा मेरे साथी रे
आँखों में कल का नज़ारा मेरे साथी रे,
नवयुग का वरदान ज़माना देखेगा,
जागेगा इंसान जमाना देखेगा,
फिरते थे मुल्कों-मुल्कों झोली पसारे,
अब से जिएँगे हम भी, अपने सहारे,
भरे हुए खलिहान जमाना देखेगा,
जागेगा इंसान ज़माना देखेगा,
फूटेगा मोती बनके अपना पसीना,
दुनिया की क़ौमें हमसे सीखेगी जीना,
कल का हिन्दुस्तान जमाना देखेगा,
जागेगा इंसान जमाना देखेगा,

Wednesday, 16 September 2015

साहिर लुधियानवी के गीत आशावादी स्वर,भविष्य के सपने, बेहतर जीवन की प्रेरणा से भरपूर हैं। उनकी एक नज़्म 'आओ कि ख्बाब बुनें कल के वास्ते... उनके ऐसे विचार को ही प्रतिबिम्बित करती है। संघर्ष से टूटे दिलों में आशा और विश्वास की संजीवनी फूंकते हैं उनके गीत...
उन्होंने लिखा है --
'न मुंह छुपा के जिए और न सर झुका के जिए,
सितमग़रों की नज़र से नज़र मिला के जिए,
अब एक रात अग़र कम जिए तो कम ही सही,
यही बहुत है कि हम मशअलें जला के जिए,
उनका जीवन भी इस बात को प्रमाणित करता है, बात चाहे शब्दों की महत्ता को प्रतिस्थापित करने को लेकर एस. डी. बर्मन, ओ.पी. नैयर, लता मंगेशकर की नाराज़गी की रही हो या सरकार के कदमों के खिलाफ लिखने पर पाकिस्तान सरकार द्वारा उनके लिए वारंट निकलने की। वे हमेशा सच और न्याय के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।
फिल्मों में अपने बिल्कुल शुरुआती दौर में "आजादी की राह पर" सन 1948 में लिखे गए उनके गीतों में से प्रस्तुत गीत है यह --
बदल रही है जिंदगी,
बदल रही है जिंदगी |
ये उजड़ी उजड़ी बस्तियां, ये लूट की निशानियाँ,
ये अजनबी पे अजनबी के ज़ुल्म की कहानियाँ,
अब इन दुखों के भार निकल रही है जिंदगी,
बदल रही है जिंदगी ।
जमीं पे सरसराहटें, फलक पे थरथराहटें,
फिजां में गूँजतीं है एक नए जहां की आहटें
मचल रही है जिंदगी, संवर रही है जिंदगी
बदल रही है जिंदगी ।
आजादी की राह पर' जो 1948 में रिलीज हुई थी,1947 में देश आजाद हुआ था यह उस दौर का लिखा फिल्म में उनके पहले गीतों में एक है। गुलामी के बोझ से कराहता देश आजाद होकर नई उमंग और उत्साह से उठ खड़े होने को तैयार था। उसके उन्हीं भावनाओं को प्रतिबिम्बित करतीं हैं ये पंक्तियाँ...