परिवार और स्कूल के बच्चों के साथ देश के सुदूर पर्वतीय स्थलों को नजदीक से देखने का अवसर एक नहीं कई - कई बार मिला। करीब से प्रकृति के रंगों को देखते हुए हर बार ज़ेहन में जिस गीत ने अपना घर बनाया और मुझे गुनगुनाने को मजबूर कर दिया उनमें यह गीत सबसे आगे है। कई बार लगा अरे यह तो मेरे ही दिल की आवाज़ है। ऐसे अविस्मरणीय दृश्य जिन्हें देख मन से बेसाख्ता फूट पडा -- क्यों न जज़्ब हो जाएं...
क्योंकि प्रकृति ही तो ईश्वर का प्रकट रूप है।
लीजिए आप भी खो जाइए शब्दों के इस जादूगर के इस जादू में...
क्योंकि प्रकृति ही तो ईश्वर का प्रकट रूप है।
लीजिए आप भी खो जाइए शब्दों के इस जादूगर के इस जादू में...
परवतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है
सुरमई उजाला है, चम्पई अंधेरा है ।
सुरमई उजाला है, चम्पई अंधेरा है ।
दोनों वक़्त मिलते हैं दो दिलों की सूरत से
आसमां ने खुश हो के, रँग सा बिखेरा है ।
आसमां ने खुश हो के, रँग सा बिखेरा है ।
ठहरे-ठहरे पानी में, गीत सरसराते हैं
भीगे-भीगे झोंकों में खुशबुओं का डेरा है ।
भीगे-भीगे झोंकों में खुशबुओं का डेरा है ।
क्यों न जज़्ब हो जाएं, इस हसीं नज़ारे में
रोशनी का झुरमट है, मस्तियों का घेरा है ।
रोशनी का झुरमट है, मस्तियों का घेरा है ।
अब किसी नज़ारे की, दिल को आरज़ू क्यों है
जब से पा लिया तुमको, सब जहान मेरा है ।
जब से पा लिया तुमको, सब जहान मेरा है ।
साहिर (शगुन -1964)
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