कल का हिंदुस्तान जमाना देखेगा
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सदियों की गुलामी के बाद देश में आजादी आई। संसाधनविहीन देश डगमगाते पैरों से उठ खड़े होने की कोशिश में लग गया। आजादी के साथ ही उसने विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा का ह्रदयविदारक दौर झेला।समस्याओं की एक अटूट सृंखला चलती चली जा रही थी। गाँधी और नेहरू की मृत्यु के बाद तो देश अनाथ सा हो गया था। ऐसे में पाकिस्तान का आक्रमण और अन्न की कमी के कारण प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को जहाँ "जय जवान" के साथ "जय किसान" का नारा ही देश को नहीं देना पड़ा। बल्कि देशवासियों से व्रत रखने की अपील भी करनी पड़ी। अमेरिका ने हमारे खाने के लिए बेकार सा गेहूँ भिजवाया। बड़ी कठिन परिस्थितियाँ थीं देश के आगे... वह आगे कैसे बढ़ता।
उसे चाहिए था कुछ सहारे कुछ सपने...जिन्हें आँखों में लिए वह दुनियाँ के देशों से होड़ करता हुआ अग्रिम कतार में खड़ा हो सके।
तभी एक फिल्म आई। नाम था "आदमी और इंसान" सारे देश को आँखों में सपना और बाजुओं में हिम्मत लिए एक जोशीला गीत सुनाई पड़ा।
चमकेगा देश हमारा मेरे साथी रे
आँखों में कल का नज़ारा मेरे साथी रे
भरे हुए खलिहान जमाना देखेगा
कल का हिंदुस्तान जमाना देखेगा,
हरित क्रांति श्वेत क्रांति का दौर चला और आज जब सैकड़ों टन अनाज रख रखाव के अभाव में सड़ जाने की खबरें आतीं हैं तो सहसा यक़ीन नहीं आता कि साहिर जादूगर ही थे या नजूमी यानी ज्योतिषी भी। आइए पूरा गीत पढ़ते हैं और प्रयास करते हैं कि बाकी के सपने कैसे पूरे किए जाएं।
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सदियों की गुलामी के बाद देश में आजादी आई। संसाधनविहीन देश डगमगाते पैरों से उठ खड़े होने की कोशिश में लग गया। आजादी के साथ ही उसने विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा का ह्रदयविदारक दौर झेला।समस्याओं की एक अटूट सृंखला चलती चली जा रही थी। गाँधी और नेहरू की मृत्यु के बाद तो देश अनाथ सा हो गया था। ऐसे में पाकिस्तान का आक्रमण और अन्न की कमी के कारण प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को जहाँ "जय जवान" के साथ "जय किसान" का नारा ही देश को नहीं देना पड़ा। बल्कि देशवासियों से व्रत रखने की अपील भी करनी पड़ी। अमेरिका ने हमारे खाने के लिए बेकार सा गेहूँ भिजवाया। बड़ी कठिन परिस्थितियाँ थीं देश के आगे... वह आगे कैसे बढ़ता।
उसे चाहिए था कुछ सहारे कुछ सपने...जिन्हें आँखों में लिए वह दुनियाँ के देशों से होड़ करता हुआ अग्रिम कतार में खड़ा हो सके।
तभी एक फिल्म आई। नाम था "आदमी और इंसान" सारे देश को आँखों में सपना और बाजुओं में हिम्मत लिए एक जोशीला गीत सुनाई पड़ा।
चमकेगा देश हमारा मेरे साथी रे
आँखों में कल का नज़ारा मेरे साथी रे
भरे हुए खलिहान जमाना देखेगा
कल का हिंदुस्तान जमाना देखेगा,
हरित क्रांति श्वेत क्रांति का दौर चला और आज जब सैकड़ों टन अनाज रख रखाव के अभाव में सड़ जाने की खबरें आतीं हैं तो सहसा यक़ीन नहीं आता कि साहिर जादूगर ही थे या नजूमी यानी ज्योतिषी भी। आइए पूरा गीत पढ़ते हैं और प्रयास करते हैं कि बाकी के सपने कैसे पूरे किए जाएं।
जागेगा इंसान जमाना देखेगा
उट्ठेगा तूफान जमाना देखेगा,
उट्ठेगा तूफान जमाना देखेगा,
बहता चलेगा मीलों नहरों का पानी,
झूमेगी खेती जैसे झूमें जवानी,
झूमेगी खेती जैसे झूमें जवानी,
चमकेगा देश हमारा मेरे साथी रे
आँखों में कल का नज़ारा मेरे साथी रे,
आँखों में कल का नज़ारा मेरे साथी रे,
नवयुग का वरदान ज़माना देखेगा,
जागेगा इंसान जमाना देखेगा,
जागेगा इंसान जमाना देखेगा,
फिरते थे मुल्कों-मुल्कों झोली पसारे,
अब से जिएँगे हम भी, अपने सहारे,
अब से जिएँगे हम भी, अपने सहारे,
भरे हुए खलिहान जमाना देखेगा,
जागेगा इंसान ज़माना देखेगा,
जागेगा इंसान ज़माना देखेगा,
फूटेगा मोती बनके अपना पसीना,
दुनिया की क़ौमें हमसे सीखेगी जीना,
दुनिया की क़ौमें हमसे सीखेगी जीना,
कल का हिन्दुस्तान जमाना देखेगा,
जागेगा इंसान जमाना देखेगा,
जागेगा इंसान जमाना देखेगा,
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