प्रसिद्ध संगीत निर्देशक जयदेव का शौक था उन्हें जब भी समय मिलता वे साहित्यकारों की लोकप्रिय रचनाओं की धुन बनाते थे।इसी क्रम में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज आनंदनारायण मुल्ला जो शायर भी थे उनकी एक ग़ज़ल की धुन उन्होंने बनाई।
ग़ज़ल का शेर था -
ग़ज़ल का शेर था -
वो रफ्ता रफ्ता जाम पिलाते चले गए,
मैं रफ्ता रफ्ता होश में आता चला गया,
मैं रफ्ता रफ्ता होश में आता चला गया,
उन दिनों देवानंद 'हम दोनों' फिल्म बना रहे थे जिसका संगीत जयदेव साहब बना रहे थे। देवानंद के आने पर जब जयदेव ने उन्हें वह धुन सुनाई जो उन्हें बहुत अच्छी लगी। 'हम दोनों' के गीत साहिर लिख रहे थे। उन दोनों को पता था कि साहिर धुन पर गीत लिखने के सख्त खिलाफ थे। उनका मानना था कि प्राथमिक गीत है धुन बाद में । मगर फिर भी उन्होंने साहिर को वह धुन सुनाई और दोस्ती का वास्ता देकर इसरार किया कि वे इस पर एक गीत लिखें।
दोस्ती की खातिर अपने उसूलों को तोड़कर साहिर ने जो गीत लिखा। क्या कभी वह आपकी जुबान पर नहीं आया ?
दोस्ती की खातिर अपने उसूलों को तोड़कर साहिर ने जो गीत लिखा। क्या कभी वह आपकी जुबान पर नहीं आया ?
मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया,
हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया,
हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया,
बरबादियों का शोक मनाना फिज़ूल था,
बरबादियो का जश्न मनाता चला गया,
बरबादियो का जश्न मनाता चला गया,
जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया,
जो खो गया मैं उसको भुलाता चला गया,
जो खो गया मैं उसको भुलाता चला गया,
ग़म और खुशी में फर्क न महसूस हो जहाँ,
मैं दिल को उस मकाम पे लाता चला गया,
मैं दिल को उस मकाम पे लाता चला गया,
बहुत रोचक जानकारी रजनीकांत जी
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