Friday, 9 December 2016

तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले,
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,
डरता है जमाने की निगाहों से भला क्या,
इन्साफ तेरे साथ है, इल्ज़ाम उठा ले
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,
क्या ख़ाक वो जीना है जो अपने ही लिए हो,
खुद मिट के किसी और को मिटने से बचा ले,
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,
टूटे हुए पतवार हैं कश्ती के तो ग़म क्या,
हारी हुई बाँहों को ही पतवार बना ले,
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,
जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा,
रोके ज़माना चाहे रोके ख़ुदाई,
तुमको आना पड़ेगा,
तरसती निगाहों ने आवाज़ दी है,
मुहब्बत की राहों ने आवाज़ दी है,
जानेहया जानेअदा छोड़ो तरसाना,
तुमको आना पड़ेगा,
ये माना हमें जाँ से जाना पड़ेगा,
पर ये समझ लो तुमने जब भी पुकारा,
हमको आना पड़ेगा,
हम अपनी वफ़ा पे न इलज़ाम लेंगे,
तुम्हें दिल दिया है तुम्हें जाँ भी देंगे,
जब इश्क़ का सौदा किया,फिर क्या घबराना,
हमको आना पड़ेगा,
आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है,
भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है,
जब तुझसे न सुलझे तेरे उलझे हुए धंधे,
भगवान के इंसाफ पे सब छोड़ दे बंदे
खुद ही तेरी मुशकिल को वो आसान करेगा,
जो तू नहीं कर पाया वो भगवान करेगा,
आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है,
भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है,
कहने की ज़रूरत नहीं आना ही बहुत है,
इस दर पे तेरा शीश झुकाना ही बहुत है,
जो कुछ तेरे दिल में है सब उसको ख़बर है,
बंदे तेरे हर हाल पे मालिक की नज़र है,
आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है,
भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है,
बिन माँगे ही मिलती हैं यहाँ मन की मुरादें,
दिल साफ हो जिनका वो यहाँ आके सदा दें,
मिलता है जहाँ न्याय वो दरबार यही है,
संसार की सबसे बड़ी सरकार यही है,
आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है,
भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है,
साथी रे साथी रे
कदम-कदम से दिल- से- दिल मिला रहे है हम
वतन में एक नया चमन खिला रहे है हम....... साथी रे भाई रे
हम आज नींव रख रहे है उस निजाम की
बिके न ज़िन्दगी जहाँ... किसी गुलाम की
लुटे न मेहनते पिसे हुए............ अवाम की
न भर सके तिजोरियां..... कोई हराम की
हर एक ऊंच नीच को......... मिटा रहे है हम
कदम-कदम से दिल से दिल मिला रहे है हम
हमारे बाजुओ में आंधियो का ज़ोर है
हमारी धड़कनो में बादलो का शोर है
हमारे हाथ में... वतन की बागडोर है
न बच के जा सकेंगे जिनके दिल में चोर है
सुनो की अपना फैसला ........ सुना रहे है हम
कदम-कदम से दिल से दिल मिला रहे है हम
उठा लिया है अब.... शमा जवां का निशाँ
अलग थलग न होगी अब हमारी खेतियाँ
चलेंगी सबके वास्ते ... मिलो की चरखियां
जमी से अस्मा तलक..... उठेंगी चिमनिया
कहा था जो अब वो करके दिखला रहे है हम
उठे वो नौजवान.. जिनको प्यार चाहिए
बढे वो दुल्हन जिन्हें...... सिंगार चाहिए
चले वो गुलसिता जिन्हें निखार चाहिए
उन्हें वो मस्तिया जिन्हें दिलदार चाहिए
की ज़िन्दगी को उसका हक़ दिला रहे है हम
ये रास्ता सुनहरी........ मंजिलो को जायेगा
ये रास्ता ख़ुशी की......... बस्तिया बसाएगा
बिछड़ गयी थी जो उन्हें...... करीब लाएगा
ये रास्ता वो है जो दिल से दिल मिलाएगा
कि अब तमाम फैसले मिटा रहे है हम
साथी रे साथी रे
कदम-कदम से दिल- से- दिल मिला रहे है हम
वतन में एक नया चमन.......खिला रहे है हम
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मायूस हूँ तेरे वादे से,
कुछ आस नहीं, कुछ आस भी है,
मैं अपने ख्यालों के सदके,
तू पास नहीं और पास भी है,
हमने तो खुशी माँगी थी मगर,
जो तूने दिया अच्छा ही दिया,
जिस ग़म का तआल्लुक हो तुझसे,
वो रास नहीं और रास भी है,
पलकों पे लरज़ते अश्कों में,
तस्वीर झलकती है तेरी,
दीदार की प्यासी आँखों को,
अब प्यास नहीं और प्यास भी है,
खुदाऐ बरतर तेरी जमीं पर,
जमीं की खातिर ये जंग क्यों है,
हर एक फतह-ओ-ज़फर के दामन पे,
खूने-इंसा का रंग क्यों है,
जमीं भी तेरी है, हम भी तेरे
ये मिल्कियत का सवाल क्यों है,
ये कत्लो -खूँ का रिवाज़ क्यों है,
ये रस्से जंग-ओ-जवाल क्यों है,
जिन्हें तलब है जहान भर की,
उन्हीं का दिल इतना तंग क्यों है,
ग़रीब माँओं शरीफ बहनों को
अम्नो-इज़्जत की जिन्दगी दे,
जिन्हें अता की है तूने ताकत,
उन्हें हिदायत की ऱोशनी दे,
सरों में कब्रो-गुरूर क्यों है,
दिलों के शीशों पे जंग क्यों है,
कज़ा के रस्ते पे जाने वालों,
को बच के आने की राह देना,
दिलों के गुलशन उजड़ न जाएं,
मुहब्बतों को पनाह देना,
जहाँ में अपने वफा के बदले,
ये जश्ने तीरो तफंग क्यों है,
साहिर की लंबी नज़्म "परछाइयाँ"
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तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरतीं हैं
कभी गुमान की सूरत कभी यकीं की तरह
वे पेड़ जिनके तले हम पनाह लेते थे
खड़े हैं आज भी साकित किसी अमीं की तरह
इन्हीं के साए में फिर आज दो धड़कते दिल
खामोश होठों से कुछ कहने-सुनने आए हैं
न जाने कितनी कशाकश से कितनी काविश से
ये सोते-जागते लमहे चुराके लाए हैं
यही फ़िज़ा थी, यही रुत, यही ज़माना था
यहीं से हमने मुहब्बत की इब्तिदा की थी
धड़कते दिल से लरज़ती हुई निगाहों से
हुजूरे-ग़ैब में नन्हीं सी इल्तिजा की थी
कि आरज़ू के कंवल खिल के फूल हो जायें
दिलो-नज़र की दुआयें कबूल हो जायें
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं।
जवान रात के सीने पे दूधिया आँचल
मचल रहा है किसी ख्वाबे-मरमरीं की तरह
हसीन फूल, हसीं पत्तियाँ, हसीं शाखें
लचक रही हैं किसी जिस्मे-नाज़नीं की तरह
फ़िज़ा में घुल से गए हैं उफ़क के नर्म खुतूत
ज़मीं हसीन है, ख्वाबों की सरज़मीं की तरह
तुम आ रही हो ज़माने की आँख से बचकर
नज़र झुकाये हुए और बदन चुराए हुए
खुद अपने कदमों की आहट से, झेंपती, डरती,
खुद अपने साये की जुंबिश से खौफ खाए हुए
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
रवाँ है छोटी-सी कश्ती हवाओं के रुख पर
नदी के साज़ पे मल्लाह गीत गाता है
तुम्हारा जिस्म हर इक लहर के झकोले से
मेरी खुली हुई बाहों में झूल जाता है
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
मैं फूल टाँक रहा हूँ तुम्हारे जूड़े में
तुम्हारी आँख मुसर्रत से झुकती जाती है
न जाने आज मैं क्या बात कहने वाला हूँ
ज़बान खुश्क है आवाज़ रुकती जाती है
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
मेरे गले में तुम्हारी गुदाज़ बाहें हैं
तुम्हारे होठों पे मेरे लबों के साये हैं
मुझे यकीं है कि हम अब कभी न बिछड़ेंगे
तुम्हें गुमान है कि हम मिलके भी पराये हैं।
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
मेरे पलंग पे बिखरी हुई किताबों को,
अदाए-अज्ज़ो-करम से उठ रही हो तुम
सुहाग-रात जो ढोलक पे गाये जाते हैं,
दबे सुरों में वही गीत गा रही हो तुम
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
वे लमहे कितने दिलकश थे वे घड़ियाँ कितनी प्यारी थीं,
वे सहरे कितने नाज़ुक थे वे लड़ियाँ कितनी प्यारी थीं
बस्ती को हर-एक शादाब गली, रुवाबों का जज़ीरा थी गोया
हर मौजे-नफ़स, हर मौजे सबा, नग़्मों का ज़खीरा थी गोया
नागाह लहकते खेतों से टापों की सदायें आने लगीं
बारूद की बोझल बू लेकर पच्छम से हवायें आने लगीं
तामीर के रोशन चेहरे पर तखरीब का बादल फैल गया
हर गाँव में वहशत नाच उठी, हर शहर में जंगल फैल गया
मग़रिब के मुहज़्ज़ब मुल्कों से कुछ खाकी वर्दी-पोश आये
इठलाते हुए मग़रूर आये, लहराते हुए मदहोश आये
खामोश ज़मीं के सीने में, खैमों की तनाबें गड़ने लगीं
मक्खन-सी मुलायम राहों पर बूटों की खराशें पड़ने लगीं
फौजों के भयानक बैंड तले चर्खों की सदायें डूब गईं
जीपों की सुलगती धूल तले फूलों की क़बायें डूब गईं
इनसान की कीमत गिरने लगी, अजनास के भाओ चढ़ने लगे
चौपाल की रौनक घटने लगी, भरती के दफ़ातर बढ़ने लगे
बस्ती के सजीले शोख जवाँ, बन-बन के सिपाही जाने लगे
जिस राह से कम ही लौट सके उस राह पे राही जाने लगे
इन जाने वाले दस्तों में ग़ैरत भी गई, बरनाई भी
माओं के जवां बेटे भी गये बहनों के चहेते भाई भी
बस्ती पे उदासी छाने लगी, मेलों की बहारें ख़त्म हुई
आमों की लचकती शाखों से झूलों की कतारें ख़त्म हुई
धूल उड़ने लगी बाज़ारों में, भूख उगने लगी खलियानों में
हर चीज़ दुकानों से उठकर, रूपोश हुई तहखानों में
बदहाल घरों की बदहाली, बढ़ते-बढ़ते जंजाल बनी
महँगाई बढ़कर काल बनी, सारी बस्ती कंगाल बनी
चरवाहियाँ रस्ता भूल गईं, पनहारियाँ पनघट छोड़ गईं
कितनी ही कंवारी अबलायें, माँ-बाप की चौखट छोड़ गईं
इफ़लास-ज़दा दहकानों के हल-बैल बिके, खलियान बिके
जीने की तमन्ना के हाथों, जीने ही के सब सामान बिके
कुछ भी न रहा जब बिकने को जिस्मों की तिजारत होने लगी
ख़लवत में भी जो ममनूअ थी वह जलवत में जसारत होने लगी
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
तुम आ रही हो सरे-आम बाल बिखराये हुये
हज़ार गोना मलामत का बार उठाये हुए
हवस-परस्त निगाहों की चीरा-दस्ती से
बदन की झेंपती उरियानियाँ छिपाए हुए
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
मैं शहर जाके हर इक दर में झाँक आया हूँ
किसी जगह मेरी मेहनत का मोल मिल न सका
सितमगरों के सियासी क़मारखाने में
अलम-नसीब फ़िरासत का मोल मिल न सका
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
तुम्हारे घर में क़यामत का शोर बर्पा है
महाज़े-जंग से हरकारा तार लाया है
कि जिसका ज़िक्र तुम्हें ज़िन्दगी से प्यारा था
वह भाई 'नर्ग़ा-ए-दुश्मन' में काम आया है
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
हर एक गाम पे बदनामियों का जमघट है
हर एक मोड़ पे रुसवाइयों के मेले हैं
न दोस्ती, न तकल्लुफ, न दिलबरी, न ख़ुलूस
किसी का कोई नहीं आज सब अकेले हैं
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
वह रहगुज़र जो मेरे दिल की तरह सूनी है
न जाने तुमको कहाँ ले के जाने वाली है
तुम्हें खरीद रहे हैं ज़मीर के कातिल
उफ़क पे खूने-तमन्नाए-दिल की लाली है
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वह शाम है अब तक याद मुझे
चाहत के सुनहरे ख़्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझे
उस शाम मुझे मालूम हुआ खेतों की तरह इस दुनियाँ में
सहमी हुई दोशीज़ाओं की मुसकान भी बेची जाती है
उस शाम मुझे मालूम हुआ, इस कारगहे-ज़रदारी में
दो भोली-भाली रूहों की पहचान भी बेची जाती है
उस शाम मुझे मालूम हुआ जब बाप की खेती छिन जाये
ममता के सुनहरे ख्वाबों की अनमोल निशानी बिकती है
उस शाम मुझे मालूम हुआ, जब भाई जंग में काम आये
सरमाए के कहबाख़ाने में बहनों की जवानी बिकती है
सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वह शाम है अब तक याद मुझे
चाहत के सुनहरे ख्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझे
तुम आज ह्ज़ारों मील यहाँ से दूर कहीं तनहाई में
या बज़्मे-तरब आराई में
मेरे सपने बुनती होगी बैठी आग़ोश पराई में।
और मैं सीने में ग़म लेकर दिन-रात मशक्कत करता हूँ,
जीने की खातिर मरता हूँ,
अपने फ़न को रुसवा करके अग़ियार का दामन भरता हूँ।
मजबूर हूँ मैं, मजबूर हो तुम, मजबूर यह दुनिया सारी है,
तन का दुख मन पर भारी है,
इस दौरे में जीने की कीमत या दारो-रसन या ख्वारी है।
मैं दारो-रसन तक जा न सका, तुम जहद की हद तक आ न सकीं
चाहा तो मगर अपना न सकीं
हम तुम दो ऐसी रूहें हैं जो मंज़िले-तस्कीं पा न सकीं।
जीने को जिये जाते हैं मगर, साँसों में चितायें जलती हैं,
खामोश वफ़ायें जलती हैं,
संगीन हक़ायक़-ज़ारों में, ख्वाबों की रिदाएँ जलती हैं।
और आज इन पेड़ों के नीचे फिर दो साये लहराये हैं,
फिर दो दिल मिलने आए हैं,
फिर मौत की आंधी उट्ठी है, फिर जंग के बादल छाये हैं,
मैं सोच रहा हूँ इनका भी अपनी ही तरह अंजाम न हो,
इनका भी जुनू बदनाम न हो,
इनके भी मुकद्दर में लिखी इक खून में लिथड़ी शाम न हो॥
सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वह शाम है अब तक याद मुझे
चाहत के सुनहरे ख्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझे॥
हमारा प्यार हवादिस की ताब ला न सका,
मगर इन्हें तो मुरादों की रात मिल जाये।
हमें तो कश्मकशे-मर्गे-बेअमा ही मिली,
इन्हें तो झूमती गाती हयात मिल जाये॥
बहुत दिनों से है यह मश्ग़ला सियासत का,
कि जब जवान हों बच्चे तो क़त्ल हो जायें।
बहुत दिनों से है यह ख़ब्त हुक्मरानों का,
कि दूर-दूर के मुल्कों में क़हत बो जायें॥
बहुत दिनों से जवानी के ख्वाब वीराँ हैं,
बहुत दिनों से मुहब्बत पनाह ढूँढती है।
बहुत दिनों में सितम-दीद शाहराहों में,
निगारे-ज़ीस्त की इस्मत पनाह ढूँढ़ती है॥
चलो कि आज सभी पायमाल रूहों से,
कहें कि अपने हर-इक ज़ख्म को जवाँ कर लें।
हमारा राज़, हमारा नहीं सभी का है,
चलो कि सारे ज़माने को राज़दाँ कर लें॥
चलो कि चल के सियासी मुकामिरों से कहें,
कि हम को जंगो-जदल के चलन से नफ़रत है।
जिसे लहू के सिवा कोई रंग रास न आये,
हमें हयात के उस पैरहन से नफ़रत है॥
कहो कि अब कोई कातिल अगर इधर आया,
तो हर कदम पे ज़मीं तंग होती जायेगी।
हर एक मौजे हवा रुख बदल के झपटेगी,
हर एक शाख रगे-संग होती जायेगी॥
उठो कि आज हर इक जंगजू से कह दें,
कि हमको काम की खातिर कलों की हाजत है।
हमें किसी की ज़मीं छीनने का शौक नहीं,
हमें तो अपनी ज़मीं पर हलों की हाजत है॥
कहो कि अब कोई ताजिर इधर का रुख न करे,
अब इस जा कोई कंवारी न बेची जाएगी।
ये खेत जाग पड़े, उठ खड़ी हुई फ़सलें,
अब इस जगह कोई क्यारी न बेची जायेगी॥
यह सर ज़मीन है गौतम की और नानक की,
इस अर्ज़े-पाक पे वहशी न चल सकेंगे कभी।
हमारा खून अमानत है नस्ले-नौ के लिए,
हमारे खून पे लश्कर न पल सकेंगे कभी॥
कहो कि आज भी हम सब अगर खामोश रहे,
तो इस दमकते हुए खाकदाँ की खैर नहीं।
जुनूँ की ढाली हुई ऐटमी बलाओं से,
ज़मीं की खैर नहीं आसमाँ की खैर नहीं॥
गुज़श्ता जंग में घर ही जले मगर इस बार,
अजब नहीं कि ये तनहाइयाँ भी जल जायें।
गुज़श्ता जंग में पैकर जले मगर इस बार,
अजब नहीं कि ये परछाइयाँ भी जल जायें॥
देखा तो था,यूँ ही किसी ग़फलत- शिआर(1) ने
दिवाना कर दिया दिल-ए-बेइख्तीयार ने
ऐ आरजू के धूंधले ख्वाबों जवाब दो ?
फिर किसकी याद आयी थी मुझको पुकारने
तुमको खबर नहीं मगर इक सादालौह (2)को
बर्बाद कर दिया तिरे दो दिन के प्यार ने
मै और तुमसे तर्के मोहब्बत( 3) की आरजू
दिवाना कर दिया हैं गम-ए-रोज़गार(4) ने
अब ए-दिल-ए तबाह! तिरा क्या ख्याल हैं
हम तो चले थे काकुले-गेती स॔वारनें
1लापरवाही 2 -सरल स्वभाव 3 त्याग 4 स॔सारिक दुःख 5 स॔सार के केश
चेहरे पे खुशी छा जाती है, आँखों में सरूर आ जाता है,
जब तुम मुझे अपना कहते हो,अपने पे ग़रूर आ जाता है,
तु हुश्न की खुद एक दुनिया हो,शायद ये तुम्हें मालूम नहीं,
महफिल में तु्म्हारे आने से, हर चीज पे नूर आ जाता है,
हम पास से तुमको क्या देखें तुम जब भी मुकाबिल होते हो,
बेताब निगाहों के आगे, परदा सा जरूर आ जाता है,
जब हमने मोहब्बत की तुमसे तब जा के कहीं ये राज़ खुला,
मरने का सलीक़ा आते ही, जीने का शऊर आ जाता है,
चेहरे पे खुशी छा जाती है,आँखों में सरूर आ जाता है,
जब तुम मुझे अपना कहते हो,अपने पे ग़रूर आ जाता है,
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी,
मुझको रातों की सियाही के सिवा कुछ न मिला,
मैं वो नग्मा हूँ जिसे प्यार की महफ़िल न मिली,
वो मुसाफिर हूँ जिसे कोई भी मंज़िल न मिली,
जख़्म पाए हैं बहारों की तमन्ना की थी,
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी,
किसी गेसू किसी आँचल का सहारा भी नहीं,
रास्ते में कोई धुँधला सा सितारा भी नहीं,
मेरी नज़रों ने नज़ारों की तमन्ना की थी,
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी,
दिल में नाकाम उम्मीदों के बसेरे पाए,
रोशनी लेने को निकला तो अँधेरे पाए,
रंग और नूर के धारों की तमन्ना की थी,
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी,
मेरी राहों से जुदा हो गईं राहें उनकी,
आज बदली नज़र आतीं हैं निगाहें उनकी,
जिनसे इस दिल ने सहारों की तमन्ना की थी,
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी,
प्यार माँगा तो सिसकते हुए अरमान मिले,
चैन चाहा तो उमड़ते हुए तूफान मिले,
डूबते दिल ने किनारों की तमन्ना की थी,
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी,
हर एक दिल में कोई अरमान है अमानत,
हर एक नजर में कोई पहचान है अमानत,
तूफान की अमानत साहिल के खुश्क बाजू,
साहिल के बाजुओं की तूफान है अमानत,
हर एक दिल में कोई अरमान है अमानत,
सोचे अगर कोई तो इंसा का अपना क्या है
ये जिस्म है अमानत, ये जान है अमानत,
हर एक दिल में कोई अरमान है अमानत,
जो तुुुमको मिल गया है तेरा नहीं है नादां,
दो रोजा जिंदगी का सामान है अमानत,
हर एक दिल में कोई अरमान है अमानत,
हर एक नजर में कोई पहचान है अमानत
जिसे तू क़ुबूल कर ले, वो अदा कहाँ से लाऊँ,
तेरे दिल को लुभा ले, वो सदा कहाँ से लाऊँ,
मैं वो फूल हूँ कि जिसको गया हर कोई मसल के,
मेरी उम्र बह गई है, मेरे आँसुओं में ढ़ल के,
जो बहार बन के बरसे, वो घटा कहाँ से लाऊँ,
तेरे दिल को लुभा ले, वो सदा कहाँ से लाऊँ,
तुझे और की तमन्ना मुझे तेरी आरज़ू है,
तेरे दिल में ग़म ही ग़म हैं,मेरे दिल में तू ही तू है,
जो दिलों को चैन दे दे, वो दवा कहाँ से लाऊँ,
तेरे दिल को लुभा ले, वो सदा कहाँ से लाऊँ,
मेरी बेबसी है जाहिर मेरी आहे-बेअसर से,
कभी मौत भी जो माँगी,तो न पाई उसके दर से,
जो मुराद ले के आए, वो दुआ कहाँ से लाऊँ,
तेरे दिल को लुभा ले, वो सदा कहाँ से लाऊँ,
जिसे तू क़ुबूल कर ले, वो अदा कहाँ से लाऊँ,
तेरे दिल को लुभा ले, वो सदा कहाँ से लाऊँ,
आज सजन मोहे अंग लगा लो,
जनम सफल हो जाए,
ह्रदय की पीड़ा देह की अगनी, 
सब शीतल हो जाए,
किए लाख जतन,मेरे मन की तपन,
मोरे तन की जलन नहीं जाए,
कैसी लागी ये लगन,कैसी जागी ये अगन,
जिया धीर धरन नहिं पाए,
प्रेम सुधा इतनी बरसा दो,
जग जलथल हो जाए,
आज सजन मोहे अंग लगा लो,
जनम सफल हो जाए,
कई जुगों से हैं जागे,मोोरे नैन अभागे,
कहीं जिया नहीं लागे बिन तोरे,
सुख दीखे नहीं आगे,दुख पीछे-पीछे भागे,
जग सूना-सूना लागे बिन तोरे,
प्रेम सुधा,ओ मेरे साँवरिया,
प्रेम सुधा इतनी बरसा दो,
जग जलथल हो जाए,
आज सजन मोहे अंग लगा लो,
जनम सफल हो जाए,
मोहे अपना बना लो,मोरी बाँह पकड़,
मैं हूँ जनम-जनम की दासी,
मोरी प्यास बुझा दो,मनहर गिरधर,
मैं हूँ अन्तरघट तक प्यासी,
प्रेम सुधा,ओ मेरे साँवरिया,
प्रेम सुधा इतनी बरसा दो,
जग जलथल हो जाए,
आज सजन मोहे अंग लगा लो,
जनम सफल हो जाए,

बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,
पल दो पल का साथ हमारा,पल दो पल की यारी,
आज नहीं तो कल करनी है, चलने की तैयारी,
बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,
कदम-कदम पर होनी बैठी अपना जाल बिछाए,
इस जीवन की राह में कोई कौन कहाँ रह जाए,
बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,
धन-दौलत के पीछे क्यों है,ये दुनियाँ दीवानी,
यहाँ की दौलत यहीं रहेगी,साथ नहीं कुछ जानी,
बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,
सोने-चाँदी में तुलता हो, जहाँ दिलों का प्यार,
आँसू भी बेकार वहाँ पर आहे भी बेकार,
बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,
दुनियाँ के बाजार में आखिर चाहत भी व्यापार बनी,
तेरे दिल से उनके दिल तक,चाँदी की दीवार बनी,
बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,
हम जैसों के भाग में लिक्खा चाहत का वरदान नहीं,
जिसने हमको जनम दिया,वो पत्थर है भगवान नहीं,
बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,
तुमने कितने सपने देखे मैंने कितने गीत बुने ?
इस दुनिया के शोर में लेकिन दिल की धड़कन कौन सुने?
सरगम की आवाज़ पे सर को धुनने वाले लाखों पाए,
नग्मों की खिलती कलियों को चुनने वाले लाखों पाए,
राख हुआ दिल जिनमें जलकर वो अंगारे कौन चुने ?
तुमने कितने सपने देखे मैंने कितने गीत बुने ?
अरमानों के सूने घर में हर आहट बेगानी निकली,
दिल ने जब नज़दीक से देखा,हर सूरत अनजानी निकली,
बोझ घड़ियाँ गिनते-गिनते,सदमें हो गए लाख गुने,?
तुमने कितने सपने देखे मैंने कितने गीत बुने ?
अगर मुझे न मिली तुम तो मैं ये समझूँगा,
कि दिल की राह से होकर खुशी नहीं गुजरी,
अगर मुझे न मिले तुम तो मैं ये समझूँगी,
कि सिर्फ उम्र कटी जिन्दगी नहीं गुजरी,
ग़ज़ल का हुश्न हो तुम,नज़्म का शबाब हो तुम,
सदा-ए-साज़ हो तुम नग्मा-ए-रवाब हो तुम,
जो दिल में सुबह जगाए वो आफ़ताब हो तुम,
अगर मुझे न मिली तुम तो मैं ये समझूँगा,
कि मेरे जहाँ से कोई रोशनी नहीं गुजरी,
फिज़ा में रंग नज़ारों में जान है तुमसे,
मेरे लिए ये जमीं आसमान है तुमसे,
ख्यालो-ख्वाब की दुनिया जवान है तुमसे,
अगर मुझे न मिले तुम तो मैं ये समझूँगी,
कि ख्वाब ख्वाब रहे वेकसी नहीं गुजरी,
बड़े यक़ीन से मैंने ये हाथ माँगा है,
मेरी वफा ने हमेशा का साथ माँगा है,
दिलों की प्यास ने आबेहयात माँगा है,
अगर मुझे न मिली तुम तो मैं ये समझूँगा,
कि दिल की रह से होकर खुशी नहीं गुजरी,
कि सिर्फ उम्र कटी जिन्दगी नहीं गुजरी,
कहीं करार मिले और कहीं खुशी न मिले,
हमारे बाद किसी को ये जिन्दगी न मिले,
सियाह नसीब कोई उनसे बढ़ के क्या होगा,
जो अपना घर भी जला दें तो रोशनी न मिले,
यही सलूक है ग़र आदमी से दुनिया का,
तो कुछ अजब नहीं दुनिया में आदमी न मिले,
ये बेबसी भी किसी बददुआ से कम तो नहीं,
कि खुल के जी न सके और मौत भी न मिले,