Friday, 9 December 2016

तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले,
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,
डरता है जमाने की निगाहों से भला क्या,
इन्साफ तेरे साथ है, इल्ज़ाम उठा ले
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,
क्या ख़ाक वो जीना है जो अपने ही लिए हो,
खुद मिट के किसी और को मिटने से बचा ले,
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,
टूटे हुए पतवार हैं कश्ती के तो ग़म क्या,
हारी हुई बाँहों को ही पतवार बना ले,
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,
जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा,
रोके ज़माना चाहे रोके ख़ुदाई,
तुमको आना पड़ेगा,
तरसती निगाहों ने आवाज़ दी है,
मुहब्बत की राहों ने आवाज़ दी है,
जानेहया जानेअदा छोड़ो तरसाना,
तुमको आना पड़ेगा,
ये माना हमें जाँ से जाना पड़ेगा,
पर ये समझ लो तुमने जब भी पुकारा,
हमको आना पड़ेगा,
हम अपनी वफ़ा पे न इलज़ाम लेंगे,
तुम्हें दिल दिया है तुम्हें जाँ भी देंगे,
जब इश्क़ का सौदा किया,फिर क्या घबराना,
हमको आना पड़ेगा,
आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है,
भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है,
जब तुझसे न सुलझे तेरे उलझे हुए धंधे,
भगवान के इंसाफ पे सब छोड़ दे बंदे
खुद ही तेरी मुशकिल को वो आसान करेगा,
जो तू नहीं कर पाया वो भगवान करेगा,
आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है,
भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है,
कहने की ज़रूरत नहीं आना ही बहुत है,
इस दर पे तेरा शीश झुकाना ही बहुत है,
जो कुछ तेरे दिल में है सब उसको ख़बर है,
बंदे तेरे हर हाल पे मालिक की नज़र है,
आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है,
भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है,
बिन माँगे ही मिलती हैं यहाँ मन की मुरादें,
दिल साफ हो जिनका वो यहाँ आके सदा दें,
मिलता है जहाँ न्याय वो दरबार यही है,
संसार की सबसे बड़ी सरकार यही है,
आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है,
भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है,
साथी रे साथी रे
कदम-कदम से दिल- से- दिल मिला रहे है हम
वतन में एक नया चमन खिला रहे है हम....... साथी रे भाई रे
हम आज नींव रख रहे है उस निजाम की
बिके न ज़िन्दगी जहाँ... किसी गुलाम की
लुटे न मेहनते पिसे हुए............ अवाम की
न भर सके तिजोरियां..... कोई हराम की
हर एक ऊंच नीच को......... मिटा रहे है हम
कदम-कदम से दिल से दिल मिला रहे है हम
हमारे बाजुओ में आंधियो का ज़ोर है
हमारी धड़कनो में बादलो का शोर है
हमारे हाथ में... वतन की बागडोर है
न बच के जा सकेंगे जिनके दिल में चोर है
सुनो की अपना फैसला ........ सुना रहे है हम
कदम-कदम से दिल से दिल मिला रहे है हम
उठा लिया है अब.... शमा जवां का निशाँ
अलग थलग न होगी अब हमारी खेतियाँ
चलेंगी सबके वास्ते ... मिलो की चरखियां
जमी से अस्मा तलक..... उठेंगी चिमनिया
कहा था जो अब वो करके दिखला रहे है हम
उठे वो नौजवान.. जिनको प्यार चाहिए
बढे वो दुल्हन जिन्हें...... सिंगार चाहिए
चले वो गुलसिता जिन्हें निखार चाहिए
उन्हें वो मस्तिया जिन्हें दिलदार चाहिए
की ज़िन्दगी को उसका हक़ दिला रहे है हम
ये रास्ता सुनहरी........ मंजिलो को जायेगा
ये रास्ता ख़ुशी की......... बस्तिया बसाएगा
बिछड़ गयी थी जो उन्हें...... करीब लाएगा
ये रास्ता वो है जो दिल से दिल मिलाएगा
कि अब तमाम फैसले मिटा रहे है हम
साथी रे साथी रे
कदम-कदम से दिल- से- दिल मिला रहे है हम
वतन में एक नया चमन.......खिला रहे है हम
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मायूस हूँ तेरे वादे से,
कुछ आस नहीं, कुछ आस भी है,
मैं अपने ख्यालों के सदके,
तू पास नहीं और पास भी है,
हमने तो खुशी माँगी थी मगर,
जो तूने दिया अच्छा ही दिया,
जिस ग़म का तआल्लुक हो तुझसे,
वो रास नहीं और रास भी है,
पलकों पे लरज़ते अश्कों में,
तस्वीर झलकती है तेरी,
दीदार की प्यासी आँखों को,
अब प्यास नहीं और प्यास भी है,
खुदाऐ बरतर तेरी जमीं पर,
जमीं की खातिर ये जंग क्यों है,
हर एक फतह-ओ-ज़फर के दामन पे,
खूने-इंसा का रंग क्यों है,
जमीं भी तेरी है, हम भी तेरे
ये मिल्कियत का सवाल क्यों है,
ये कत्लो -खूँ का रिवाज़ क्यों है,
ये रस्से जंग-ओ-जवाल क्यों है,
जिन्हें तलब है जहान भर की,
उन्हीं का दिल इतना तंग क्यों है,
ग़रीब माँओं शरीफ बहनों को
अम्नो-इज़्जत की जिन्दगी दे,
जिन्हें अता की है तूने ताकत,
उन्हें हिदायत की ऱोशनी दे,
सरों में कब्रो-गुरूर क्यों है,
दिलों के शीशों पे जंग क्यों है,
कज़ा के रस्ते पे जाने वालों,
को बच के आने की राह देना,
दिलों के गुलशन उजड़ न जाएं,
मुहब्बतों को पनाह देना,
जहाँ में अपने वफा के बदले,
ये जश्ने तीरो तफंग क्यों है,
साहिर की लंबी नज़्म "परछाइयाँ"
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तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरतीं हैं
कभी गुमान की सूरत कभी यकीं की तरह
वे पेड़ जिनके तले हम पनाह लेते थे
खड़े हैं आज भी साकित किसी अमीं की तरह
इन्हीं के साए में फिर आज दो धड़कते दिल
खामोश होठों से कुछ कहने-सुनने आए हैं
न जाने कितनी कशाकश से कितनी काविश से
ये सोते-जागते लमहे चुराके लाए हैं
यही फ़िज़ा थी, यही रुत, यही ज़माना था
यहीं से हमने मुहब्बत की इब्तिदा की थी
धड़कते दिल से लरज़ती हुई निगाहों से
हुजूरे-ग़ैब में नन्हीं सी इल्तिजा की थी
कि आरज़ू के कंवल खिल के फूल हो जायें
दिलो-नज़र की दुआयें कबूल हो जायें
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं।
जवान रात के सीने पे दूधिया आँचल
मचल रहा है किसी ख्वाबे-मरमरीं की तरह
हसीन फूल, हसीं पत्तियाँ, हसीं शाखें
लचक रही हैं किसी जिस्मे-नाज़नीं की तरह
फ़िज़ा में घुल से गए हैं उफ़क के नर्म खुतूत
ज़मीं हसीन है, ख्वाबों की सरज़मीं की तरह
तुम आ रही हो ज़माने की आँख से बचकर
नज़र झुकाये हुए और बदन चुराए हुए
खुद अपने कदमों की आहट से, झेंपती, डरती,
खुद अपने साये की जुंबिश से खौफ खाए हुए
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
रवाँ है छोटी-सी कश्ती हवाओं के रुख पर
नदी के साज़ पे मल्लाह गीत गाता है
तुम्हारा जिस्म हर इक लहर के झकोले से
मेरी खुली हुई बाहों में झूल जाता है
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
मैं फूल टाँक रहा हूँ तुम्हारे जूड़े में
तुम्हारी आँख मुसर्रत से झुकती जाती है
न जाने आज मैं क्या बात कहने वाला हूँ
ज़बान खुश्क है आवाज़ रुकती जाती है
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
मेरे गले में तुम्हारी गुदाज़ बाहें हैं
तुम्हारे होठों पे मेरे लबों के साये हैं
मुझे यकीं है कि हम अब कभी न बिछड़ेंगे
तुम्हें गुमान है कि हम मिलके भी पराये हैं।
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
मेरे पलंग पे बिखरी हुई किताबों को,
अदाए-अज्ज़ो-करम से उठ रही हो तुम
सुहाग-रात जो ढोलक पे गाये जाते हैं,
दबे सुरों में वही गीत गा रही हो तुम
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
वे लमहे कितने दिलकश थे वे घड़ियाँ कितनी प्यारी थीं,
वे सहरे कितने नाज़ुक थे वे लड़ियाँ कितनी प्यारी थीं
बस्ती को हर-एक शादाब गली, रुवाबों का जज़ीरा थी गोया
हर मौजे-नफ़स, हर मौजे सबा, नग़्मों का ज़खीरा थी गोया
नागाह लहकते खेतों से टापों की सदायें आने लगीं
बारूद की बोझल बू लेकर पच्छम से हवायें आने लगीं
तामीर के रोशन चेहरे पर तखरीब का बादल फैल गया
हर गाँव में वहशत नाच उठी, हर शहर में जंगल फैल गया
मग़रिब के मुहज़्ज़ब मुल्कों से कुछ खाकी वर्दी-पोश आये
इठलाते हुए मग़रूर आये, लहराते हुए मदहोश आये
खामोश ज़मीं के सीने में, खैमों की तनाबें गड़ने लगीं
मक्खन-सी मुलायम राहों पर बूटों की खराशें पड़ने लगीं
फौजों के भयानक बैंड तले चर्खों की सदायें डूब गईं
जीपों की सुलगती धूल तले फूलों की क़बायें डूब गईं
इनसान की कीमत गिरने लगी, अजनास के भाओ चढ़ने लगे
चौपाल की रौनक घटने लगी, भरती के दफ़ातर बढ़ने लगे
बस्ती के सजीले शोख जवाँ, बन-बन के सिपाही जाने लगे
जिस राह से कम ही लौट सके उस राह पे राही जाने लगे
इन जाने वाले दस्तों में ग़ैरत भी गई, बरनाई भी
माओं के जवां बेटे भी गये बहनों के चहेते भाई भी
बस्ती पे उदासी छाने लगी, मेलों की बहारें ख़त्म हुई
आमों की लचकती शाखों से झूलों की कतारें ख़त्म हुई
धूल उड़ने लगी बाज़ारों में, भूख उगने लगी खलियानों में
हर चीज़ दुकानों से उठकर, रूपोश हुई तहखानों में
बदहाल घरों की बदहाली, बढ़ते-बढ़ते जंजाल बनी
महँगाई बढ़कर काल बनी, सारी बस्ती कंगाल बनी
चरवाहियाँ रस्ता भूल गईं, पनहारियाँ पनघट छोड़ गईं
कितनी ही कंवारी अबलायें, माँ-बाप की चौखट छोड़ गईं
इफ़लास-ज़दा दहकानों के हल-बैल बिके, खलियान बिके
जीने की तमन्ना के हाथों, जीने ही के सब सामान बिके
कुछ भी न रहा जब बिकने को जिस्मों की तिजारत होने लगी
ख़लवत में भी जो ममनूअ थी वह जलवत में जसारत होने लगी
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
तुम आ रही हो सरे-आम बाल बिखराये हुये
हज़ार गोना मलामत का बार उठाये हुए
हवस-परस्त निगाहों की चीरा-दस्ती से
बदन की झेंपती उरियानियाँ छिपाए हुए
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
मैं शहर जाके हर इक दर में झाँक आया हूँ
किसी जगह मेरी मेहनत का मोल मिल न सका
सितमगरों के सियासी क़मारखाने में
अलम-नसीब फ़िरासत का मोल मिल न सका
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
तुम्हारे घर में क़यामत का शोर बर्पा है
महाज़े-जंग से हरकारा तार लाया है
कि जिसका ज़िक्र तुम्हें ज़िन्दगी से प्यारा था
वह भाई 'नर्ग़ा-ए-दुश्मन' में काम आया है
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
हर एक गाम पे बदनामियों का जमघट है
हर एक मोड़ पे रुसवाइयों के मेले हैं
न दोस्ती, न तकल्लुफ, न दिलबरी, न ख़ुलूस
किसी का कोई नहीं आज सब अकेले हैं
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
वह रहगुज़र जो मेरे दिल की तरह सूनी है
न जाने तुमको कहाँ ले के जाने वाली है
तुम्हें खरीद रहे हैं ज़मीर के कातिल
उफ़क पे खूने-तमन्नाए-दिल की लाली है
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वह शाम है अब तक याद मुझे
चाहत के सुनहरे ख़्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझे
उस शाम मुझे मालूम हुआ खेतों की तरह इस दुनियाँ में
सहमी हुई दोशीज़ाओं की मुसकान भी बेची जाती है
उस शाम मुझे मालूम हुआ, इस कारगहे-ज़रदारी में
दो भोली-भाली रूहों की पहचान भी बेची जाती है
उस शाम मुझे मालूम हुआ जब बाप की खेती छिन जाये
ममता के सुनहरे ख्वाबों की अनमोल निशानी बिकती है
उस शाम मुझे मालूम हुआ, जब भाई जंग में काम आये
सरमाए के कहबाख़ाने में बहनों की जवानी बिकती है
सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वह शाम है अब तक याद मुझे
चाहत के सुनहरे ख्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझे
तुम आज ह्ज़ारों मील यहाँ से दूर कहीं तनहाई में
या बज़्मे-तरब आराई में
मेरे सपने बुनती होगी बैठी आग़ोश पराई में।
और मैं सीने में ग़म लेकर दिन-रात मशक्कत करता हूँ,
जीने की खातिर मरता हूँ,
अपने फ़न को रुसवा करके अग़ियार का दामन भरता हूँ।
मजबूर हूँ मैं, मजबूर हो तुम, मजबूर यह दुनिया सारी है,
तन का दुख मन पर भारी है,
इस दौरे में जीने की कीमत या दारो-रसन या ख्वारी है।
मैं दारो-रसन तक जा न सका, तुम जहद की हद तक आ न सकीं
चाहा तो मगर अपना न सकीं
हम तुम दो ऐसी रूहें हैं जो मंज़िले-तस्कीं पा न सकीं।
जीने को जिये जाते हैं मगर, साँसों में चितायें जलती हैं,
खामोश वफ़ायें जलती हैं,
संगीन हक़ायक़-ज़ारों में, ख्वाबों की रिदाएँ जलती हैं।
और आज इन पेड़ों के नीचे फिर दो साये लहराये हैं,
फिर दो दिल मिलने आए हैं,
फिर मौत की आंधी उट्ठी है, फिर जंग के बादल छाये हैं,
मैं सोच रहा हूँ इनका भी अपनी ही तरह अंजाम न हो,
इनका भी जुनू बदनाम न हो,
इनके भी मुकद्दर में लिखी इक खून में लिथड़ी शाम न हो॥
सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वह शाम है अब तक याद मुझे
चाहत के सुनहरे ख्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझे॥
हमारा प्यार हवादिस की ताब ला न सका,
मगर इन्हें तो मुरादों की रात मिल जाये।
हमें तो कश्मकशे-मर्गे-बेअमा ही मिली,
इन्हें तो झूमती गाती हयात मिल जाये॥
बहुत दिनों से है यह मश्ग़ला सियासत का,
कि जब जवान हों बच्चे तो क़त्ल हो जायें।
बहुत दिनों से है यह ख़ब्त हुक्मरानों का,
कि दूर-दूर के मुल्कों में क़हत बो जायें॥
बहुत दिनों से जवानी के ख्वाब वीराँ हैं,
बहुत दिनों से मुहब्बत पनाह ढूँढती है।
बहुत दिनों में सितम-दीद शाहराहों में,
निगारे-ज़ीस्त की इस्मत पनाह ढूँढ़ती है॥
चलो कि आज सभी पायमाल रूहों से,
कहें कि अपने हर-इक ज़ख्म को जवाँ कर लें।
हमारा राज़, हमारा नहीं सभी का है,
चलो कि सारे ज़माने को राज़दाँ कर लें॥
चलो कि चल के सियासी मुकामिरों से कहें,
कि हम को जंगो-जदल के चलन से नफ़रत है।
जिसे लहू के सिवा कोई रंग रास न आये,
हमें हयात के उस पैरहन से नफ़रत है॥
कहो कि अब कोई कातिल अगर इधर आया,
तो हर कदम पे ज़मीं तंग होती जायेगी।
हर एक मौजे हवा रुख बदल के झपटेगी,
हर एक शाख रगे-संग होती जायेगी॥
उठो कि आज हर इक जंगजू से कह दें,
कि हमको काम की खातिर कलों की हाजत है।
हमें किसी की ज़मीं छीनने का शौक नहीं,
हमें तो अपनी ज़मीं पर हलों की हाजत है॥
कहो कि अब कोई ताजिर इधर का रुख न करे,
अब इस जा कोई कंवारी न बेची जाएगी।
ये खेत जाग पड़े, उठ खड़ी हुई फ़सलें,
अब इस जगह कोई क्यारी न बेची जायेगी॥
यह सर ज़मीन है गौतम की और नानक की,
इस अर्ज़े-पाक पे वहशी न चल सकेंगे कभी।
हमारा खून अमानत है नस्ले-नौ के लिए,
हमारे खून पे लश्कर न पल सकेंगे कभी॥
कहो कि आज भी हम सब अगर खामोश रहे,
तो इस दमकते हुए खाकदाँ की खैर नहीं।
जुनूँ की ढाली हुई ऐटमी बलाओं से,
ज़मीं की खैर नहीं आसमाँ की खैर नहीं॥
गुज़श्ता जंग में घर ही जले मगर इस बार,
अजब नहीं कि ये तनहाइयाँ भी जल जायें।
गुज़श्ता जंग में पैकर जले मगर इस बार,
अजब नहीं कि ये परछाइयाँ भी जल जायें॥
देखा तो था,यूँ ही किसी ग़फलत- शिआर(1) ने
दिवाना कर दिया दिल-ए-बेइख्तीयार ने
ऐ आरजू के धूंधले ख्वाबों जवाब दो ?
फिर किसकी याद आयी थी मुझको पुकारने
तुमको खबर नहीं मगर इक सादालौह (2)को
बर्बाद कर दिया तिरे दो दिन के प्यार ने
मै और तुमसे तर्के मोहब्बत( 3) की आरजू
दिवाना कर दिया हैं गम-ए-रोज़गार(4) ने
अब ए-दिल-ए तबाह! तिरा क्या ख्याल हैं
हम तो चले थे काकुले-गेती स॔वारनें
1लापरवाही 2 -सरल स्वभाव 3 त्याग 4 स॔सारिक दुःख 5 स॔सार के केश
चेहरे पे खुशी छा जाती है, आँखों में सरूर आ जाता है,
जब तुम मुझे अपना कहते हो,अपने पे ग़रूर आ जाता है,
तु हुश्न की खुद एक दुनिया हो,शायद ये तुम्हें मालूम नहीं,
महफिल में तु्म्हारे आने से, हर चीज पे नूर आ जाता है,
हम पास से तुमको क्या देखें तुम जब भी मुकाबिल होते हो,
बेताब निगाहों के आगे, परदा सा जरूर आ जाता है,
जब हमने मोहब्बत की तुमसे तब जा के कहीं ये राज़ खुला,
मरने का सलीक़ा आते ही, जीने का शऊर आ जाता है,
चेहरे पे खुशी छा जाती है,आँखों में सरूर आ जाता है,
जब तुम मुझे अपना कहते हो,अपने पे ग़रूर आ जाता है,
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी,
मुझको रातों की सियाही के सिवा कुछ न मिला,
मैं वो नग्मा हूँ जिसे प्यार की महफ़िल न मिली,
वो मुसाफिर हूँ जिसे कोई भी मंज़िल न मिली,
जख़्म पाए हैं बहारों की तमन्ना की थी,
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी,
किसी गेसू किसी आँचल का सहारा भी नहीं,
रास्ते में कोई धुँधला सा सितारा भी नहीं,
मेरी नज़रों ने नज़ारों की तमन्ना की थी,
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी,
दिल में नाकाम उम्मीदों के बसेरे पाए,
रोशनी लेने को निकला तो अँधेरे पाए,
रंग और नूर के धारों की तमन्ना की थी,
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी,
मेरी राहों से जुदा हो गईं राहें उनकी,
आज बदली नज़र आतीं हैं निगाहें उनकी,
जिनसे इस दिल ने सहारों की तमन्ना की थी,
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी,
प्यार माँगा तो सिसकते हुए अरमान मिले,
चैन चाहा तो उमड़ते हुए तूफान मिले,
डूबते दिल ने किनारों की तमन्ना की थी,
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी,
हर एक दिल में कोई अरमान है अमानत,
हर एक नजर में कोई पहचान है अमानत,
तूफान की अमानत साहिल के खुश्क बाजू,
साहिल के बाजुओं की तूफान है अमानत,
हर एक दिल में कोई अरमान है अमानत,
सोचे अगर कोई तो इंसा का अपना क्या है
ये जिस्म है अमानत, ये जान है अमानत,
हर एक दिल में कोई अरमान है अमानत,
जो तुुुमको मिल गया है तेरा नहीं है नादां,
दो रोजा जिंदगी का सामान है अमानत,
हर एक दिल में कोई अरमान है अमानत,
हर एक नजर में कोई पहचान है अमानत
जिसे तू क़ुबूल कर ले, वो अदा कहाँ से लाऊँ,
तेरे दिल को लुभा ले, वो सदा कहाँ से लाऊँ,
मैं वो फूल हूँ कि जिसको गया हर कोई मसल के,
मेरी उम्र बह गई है, मेरे आँसुओं में ढ़ल के,
जो बहार बन के बरसे, वो घटा कहाँ से लाऊँ,
तेरे दिल को लुभा ले, वो सदा कहाँ से लाऊँ,
तुझे और की तमन्ना मुझे तेरी आरज़ू है,
तेरे दिल में ग़म ही ग़म हैं,मेरे दिल में तू ही तू है,
जो दिलों को चैन दे दे, वो दवा कहाँ से लाऊँ,
तेरे दिल को लुभा ले, वो सदा कहाँ से लाऊँ,
मेरी बेबसी है जाहिर मेरी आहे-बेअसर से,
कभी मौत भी जो माँगी,तो न पाई उसके दर से,
जो मुराद ले के आए, वो दुआ कहाँ से लाऊँ,
तेरे दिल को लुभा ले, वो सदा कहाँ से लाऊँ,
जिसे तू क़ुबूल कर ले, वो अदा कहाँ से लाऊँ,
तेरे दिल को लुभा ले, वो सदा कहाँ से लाऊँ,
आज सजन मोहे अंग लगा लो,
जनम सफल हो जाए,
ह्रदय की पीड़ा देह की अगनी, 
सब शीतल हो जाए,
किए लाख जतन,मेरे मन की तपन,
मोरे तन की जलन नहीं जाए,
कैसी लागी ये लगन,कैसी जागी ये अगन,
जिया धीर धरन नहिं पाए,
प्रेम सुधा इतनी बरसा दो,
जग जलथल हो जाए,
आज सजन मोहे अंग लगा लो,
जनम सफल हो जाए,
कई जुगों से हैं जागे,मोोरे नैन अभागे,
कहीं जिया नहीं लागे बिन तोरे,
सुख दीखे नहीं आगे,दुख पीछे-पीछे भागे,
जग सूना-सूना लागे बिन तोरे,
प्रेम सुधा,ओ मेरे साँवरिया,
प्रेम सुधा इतनी बरसा दो,
जग जलथल हो जाए,
आज सजन मोहे अंग लगा लो,
जनम सफल हो जाए,
मोहे अपना बना लो,मोरी बाँह पकड़,
मैं हूँ जनम-जनम की दासी,
मोरी प्यास बुझा दो,मनहर गिरधर,
मैं हूँ अन्तरघट तक प्यासी,
प्रेम सुधा,ओ मेरे साँवरिया,
प्रेम सुधा इतनी बरसा दो,
जग जलथल हो जाए,
आज सजन मोहे अंग लगा लो,
जनम सफल हो जाए,

बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,
पल दो पल का साथ हमारा,पल दो पल की यारी,
आज नहीं तो कल करनी है, चलने की तैयारी,
बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,
कदम-कदम पर होनी बैठी अपना जाल बिछाए,
इस जीवन की राह में कोई कौन कहाँ रह जाए,
बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,
धन-दौलत के पीछे क्यों है,ये दुनियाँ दीवानी,
यहाँ की दौलत यहीं रहेगी,साथ नहीं कुछ जानी,
बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,
सोने-चाँदी में तुलता हो, जहाँ दिलों का प्यार,
आँसू भी बेकार वहाँ पर आहे भी बेकार,
बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,
दुनियाँ के बाजार में आखिर चाहत भी व्यापार बनी,
तेरे दिल से उनके दिल तक,चाँदी की दीवार बनी,
बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,
हम जैसों के भाग में लिक्खा चाहत का वरदान नहीं,
जिसने हमको जनम दिया,वो पत्थर है भगवान नहीं,
बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,
तुमने कितने सपने देखे मैंने कितने गीत बुने ?
इस दुनिया के शोर में लेकिन दिल की धड़कन कौन सुने?
सरगम की आवाज़ पे सर को धुनने वाले लाखों पाए,
नग्मों की खिलती कलियों को चुनने वाले लाखों पाए,
राख हुआ दिल जिनमें जलकर वो अंगारे कौन चुने ?
तुमने कितने सपने देखे मैंने कितने गीत बुने ?
अरमानों के सूने घर में हर आहट बेगानी निकली,
दिल ने जब नज़दीक से देखा,हर सूरत अनजानी निकली,
बोझ घड़ियाँ गिनते-गिनते,सदमें हो गए लाख गुने,?
तुमने कितने सपने देखे मैंने कितने गीत बुने ?
अगर मुझे न मिली तुम तो मैं ये समझूँगा,
कि दिल की राह से होकर खुशी नहीं गुजरी,
अगर मुझे न मिले तुम तो मैं ये समझूँगी,
कि सिर्फ उम्र कटी जिन्दगी नहीं गुजरी,
ग़ज़ल का हुश्न हो तुम,नज़्म का शबाब हो तुम,
सदा-ए-साज़ हो तुम नग्मा-ए-रवाब हो तुम,
जो दिल में सुबह जगाए वो आफ़ताब हो तुम,
अगर मुझे न मिली तुम तो मैं ये समझूँगा,
कि मेरे जहाँ से कोई रोशनी नहीं गुजरी,
फिज़ा में रंग नज़ारों में जान है तुमसे,
मेरे लिए ये जमीं आसमान है तुमसे,
ख्यालो-ख्वाब की दुनिया जवान है तुमसे,
अगर मुझे न मिले तुम तो मैं ये समझूँगी,
कि ख्वाब ख्वाब रहे वेकसी नहीं गुजरी,
बड़े यक़ीन से मैंने ये हाथ माँगा है,
मेरी वफा ने हमेशा का साथ माँगा है,
दिलों की प्यास ने आबेहयात माँगा है,
अगर मुझे न मिली तुम तो मैं ये समझूँगा,
कि दिल की रह से होकर खुशी नहीं गुजरी,
कि सिर्फ उम्र कटी जिन्दगी नहीं गुजरी,
कहीं करार मिले और कहीं खुशी न मिले,
हमारे बाद किसी को ये जिन्दगी न मिले,
सियाह नसीब कोई उनसे बढ़ के क्या होगा,
जो अपना घर भी जला दें तो रोशनी न मिले,
यही सलूक है ग़र आदमी से दुनिया का,
तो कुछ अजब नहीं दुनिया में आदमी न मिले,
ये बेबसी भी किसी बददुआ से कम तो नहीं,
कि खुल के जी न सके और मौत भी न मिले,

Friday, 11 November 2016

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते,
वरना ये रात आज के संगीन दौर की,
डस लेगी जानो-दिल को कुछ ऐसे कि जानो-दिल,
ताउम्र फिर न कोई हंसी ख़्वाब बुन सकें,
गो हमसे भागती रही ये तेज़गाम उम्र,
ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र,

जुल्फ़ों के ख़्वाब,होटों के ख़्वाब और बदन के ख़्वाब,
मेराजे-फन के ख़्वाब,कमाले-सुखन के ख़्वाब,
तहज़ीबे-जिन्दगी के,फरोगे-वतन के ख़्वाब,
जि़ंदां के ख़्वाब कूचा-ए-दारो-रसन के ख़्वाब,

ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे,
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल की असास थे,
ये ख़्वाब मर गए हैं तो बेरंग है हयात,
यूं है कि जैसे दस्ते-तहे-संग है हयात,

आओ कि कोई ख़्वाब बुने कल के वास्ते,.
आदमी को जीना है, 
ज़हर हो कि अमृत हो मुस्करा के पीना है,

धूप भी है छाँव भी है जिन्दगी की राहों में,
जितने दुख है जितने सुख है सबको ले ले बांहों में,

ग़म उन्ही को घेरता है ग़म से जो घबराए हैं,
क्या बुरे दिन क्या भले दिन,सब गुजरते साये हैं,

मैंने माना इक अनोखा दर्द तेरे दिल में है,
वह खुशी क्यों खो रहा है,जो खुशी महफ़िल में है,
रात के राही थक मत जाना,सुबह की मंज़िल दूर नहीं,

धरती के फैले आँगन में,पल दो पल है रात का डेरा,
ज़ुल्म का सीना चीर के देखो,झाँक रहा है नया सवेरा,
ढलता दिन मजबूर सही,चढ़ता सूरज मजबूर नही,

सदियों तक चुप रहने वाले अब अपना हक लेके रहेंगे,
जो करना है खुल के करेंगे, जो कहना है साफ कहेंगे,
जीते जी घुट-घुट कर मरना,इस युग का दस्तूर नहीं

टूटेंगी बोझिल ज़ंजीरें, जागेंगी सोई तक़दीरें
लूट पे कब तक पहरा देंगी,जंग लगी खूनी शमशीरें,
रह नहीं सकता इस दुनिया में जो सबको मंजूर नहीं,
अपनी धरती पे सदियों से छाई हुई ,जुल्म और लूट की संगदिल रात है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,ये न समझो कि ये आज की बात है,

जबसे धरती बनी,जब से दुनिया बसी हम यूँ ही जिन्दगी को तरसते रहे,
मौत की आँधियाँ बनके छा तीं रहीं, आग और खूँ के बादल बरसते रहे,

तुम भी मजबूर हो हम भी मजबूर हैं,क्या करें ये बुज़ुर्गों की सौगात है,
ये समझो कि ये आज की बात है,....

हम अंधेरी गुफाओं से निकले मगर रोशनी अपने सीनों से फूटी नहीं,
हमने जंगल तो शहरों बदले मगर, हमसे जंगल की तहज़़ीब छूटी नहीं,

अपनी बदनाम इंसानियत की कसम, अपनी हैवानियत आज भी साथ है,
ये न समझो कि ये आज की बात है......


हमने सुकरात को जहर की भेंट दी,और मसीहा को सूली का तख्ता दिया,
हमने गाँधी के सीने को छलनी किया, कनेडी सा जवाँ खूँ में नहला दिया,

हर मुसीबत जो इंसान पर आई है, इस मुसीबत में इंसान का हाथ है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,

हिरोशिमा की झुलसी जमीं की कसम,नागासाकी की सुलगी फ़िजा की कसम,
जिन पे जंगल का कानून भी थूक दे, ऐटमी दौर के वो दरिन्दे हैं हम,

अपनी बढ़ती हुई नस्ल खुद फूँक दे,ऐसी बदजात अपनी ही एक जात है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,

हम तबाही के रस्ते पे इतना बढ़े,अब तबाही का रस्ता ही बाकी नही,
खूने-इंसा जहाँ स़ागरों में बँटे,इसके आगे वो महफिल वो साकी नहीं,

इस अंधेरे की इतनी ही औकात थी,इसके आगे उजालों की बारात है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,
साथी हाथ बढ़ाना,साथी हाथ बढ़ाना,
एक अकेला थक जाएगा,मिलकर बोझ उठाना,
साथी हाथ बढ़ाना,

हम मेहनत वालों ने जब भी मिलकर कदम बढ़ाया,
सागर ने रस्ता छोड़ा परवत ने शीश झुकाया,

फौलादी हैं सीने अपने फौलादी हैं बाँहें,
हम चाहें तो पैदाकर दें चट्टानों में राहें,
साथी हाथ बढ़ाना,

मेहनत अपने लेख की रेखा मेहनत से क्या डरना,
कल गैरों की खातिर की आज अपनी खातिर करना,

अपना दुख भी एक है साथी,अपना सुख भी एक,
अपनी मंज़िल सच की मंज़िल अपना रस्ता नेक,
साथी हाथ बढ़ाना,

एक से एक मिले तो क़तरा बन जाता है दरिया,
एक से एक मिले तो ज़र्रा बन जाता है सहरा,

एक से एक मिले तो राई बन सकती है परवत,
एक से एक मिले तो इंसां वश में कर ले किस्मत,
साथी हाथ बढ़ाना,

माटी से हम लाल निकालें,मोती लाएं जल से,
जो कुछ इस दुनिया में बना है बना हमारे बल से,

कब तक मेहनत के पैरों में दौलत की ज़ंजीरें ?
हाथ बढ़ाकर छीन लो अपने ख्वाबों की ताबीरे,
साथी हाथ बढ़ाना,
तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले,
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,

डरता है जमाने की निगाहों से भला क्या,
इन्साफ तेरे साथ है, इल्ज़ाम उठा ले,
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,

क्या ख़ाक वो जीना है जो अपने ही लिए हो,
खुद मिट के किसी और को मिटने से बचा ले,
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,

टूटे हुए पतवार हैं कश्ती के तो ग़म क्या,
हारी हुई बाँहों को ही पतवार बना ले,
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

इन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढ़लकेगा,
जब दुःख के बादल पिघलेंगेजब सुख का सूरज छलकेगा,

जब अम्बर झूम के नाचेगा,जब धरती नज़्में गाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

जिस सुबह की खातिर जुग-जुग से,हम सब मर-मर कर जीते हैं,
जिस सुबह के अमृत की धुन मे हम जहर के प्याले पीते हैं,

इन भूखी-प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फरमाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं,
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इन्सानों की क़ीमत कुछ भी नहीं,

इन्सानों की इज़्ज़त जब झूठे, सिक्कों में न तौली जाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

दौलत के लिए जब औरत की अस्मत को न बेचा जाएगा,
चाहत को न कुचला जाएगा, ग़ैरत को न बेचा जाएगा,

अपनी काली करतूतों पर, जब ये दुनिया शरमाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

बीतेंगे कभी तो दिन आखिर,ये भूख के और बेकारी के,
टूटेंगे कभी तो बुत आखिर,  दौलत की इज़ारादारी के,

जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

मजबूर बुढ़ापा जब, सूनी राहों की धूल न फाँकेगा,
मासूम लड़कपन जब,गंदी गलियों में भीख न माँगेगा,

हक़ माँगनेवालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

फ़ाक़ों की चिताओं पर जिस दिन इन्सां न जलाए जाएंगे,
सीनों के दहकते दोज़ख में  अरमां न जलाए जाएंगे,

ये नरक से भी गन्दी दुनियाँ जब स्वर्ग बनाई जाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,
क्या ग़म जो अँधेरी हैं रातें,
इक शमा-ए-तमन्ना साथ तो है
कुछ और सहारा हो के न हो,
हाथों में तुम्हारा हाथ तो है ।
क्या जानिए कितने दीवाने
घर फूंक तमाशा देख चुके
जिस प्यार की दुनिया दुश्मन है,
उस प्यार में कोई बात तो है ।
साहिर लुधियानवी के गीत आशावादी स्वर,भविष्य के सपने, बेहतर जीवन की प्रेरणा से भरपूर हैं। उनकी एक नज़्म 'आओ कि ख्बाब बुनें कल के वास्ते... उनके ऐसे विचार को ही प्रतिबिम्बित करती है। संघर्ष से टूटे दिलों में आशा और विश्वास की संजीवनी फूंकते हैं उनके गीत...
उन्होंने लिखा है --
'न मुंह छुपा के जिए और न सर झुका के जिए,
सितमग़रों की नज़र से नज़र मिला के जिए,
अब एक रात अग़र कम जिए तो कम ही सही,
यही बहुत है कि हम मशअलें जला के जिए,
उनका जीवन भी इस बात को प्रमाणित करता है, बात चाहे शब्दों की महत्ता को प्रतिस्थापित करने को लेकर एस. डी. बर्मन, ओ.पी. नैयर, लता मंगेशकर की नाराज़गी की रही हो या सरकार के कदमों के खिलाफ लिखने पर पाकिस्तान सरकार द्वारा उनके लिए वारंट निकलने की। वे हमेशा सच और न्याय के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।
फिल्मों में अपने बिल्कुल शुरुआती दौर में "आजादी की राह पर" सन 1948 में लिखे गए उनके गीतों में से प्रस्तुत गीत है यह --
बदल रही है जिंदगी,
बदल रही है जिंदगी |
ये उजड़ी उजड़ी बस्तियां, ये लूट की निशानियाँ,
ये अजनबी पे अजनबी के ज़ुल्म की कहानियाँ,
अब इन दुखों के भार निकल रही है जिंदगी,
बदल रही है जिंदगी ।
जमीं पे सरसराहटें, फलक पे थरथराहटें,
फिजां में गूँजतीं है एक नए जहां की आहटें
मचल रही है जिंदगी, संवर रही है जिंदगी
बदल रही है जिंदगी ।
आजादी की राह पर' जो 1948 में रिलीज हुई थी,1947 में देश आजाद हुआ था यह उस दौर का लिखा फिल्म में उनके पहले गीतों में एक है। गुलामी के बोझ से कराहता देश आजाद होकर नई उमंग और उत्साह से उठ खड़े होने को तैयार था। उसके उन्हीं भावनाओं को प्रतिबिम्बित करतीं हैं ये पंक्तियाँ...
चाँद मद्धम है, आसमा चुप है, नींद की गोद में जहाँ चुप है,

दूर वादी में दूधिया बादल,झुक के पर्वत को प्यार करते हैं,
दिल में नाकाम हसरतें लेकर, हम तेरा इंतजार करते हैं,

इन बहारों के साए में आजा,फिर मोहब्बत जवाँ रहे न रहे,
जिन्दगी तेरी नामुरादों पर, कल तलक मेहरबाँ रहे न रहे,

रोज की तरह आज भी तारे, सुबह की गर्द में ना खो जाएँ,
आ तेरे ग़म में जागती आँखें,कम से कम एक रात सो जाएँ,

चाँद मद्धम है,आसमा चुप है,नींद की गोद में जहाँ चुप है,
हम और तुम,
तुम और हम,
खुश हैं यूँ आज मिलके,
जैसे किसी संगम पर,
मिल जाएँ दो नदियाँ,
तन्हा बहते-बहते,
मुड़ के क्यों देखे पीछे चाहे कुछ भी हो,
चलते ही जाएं नई मंज़िलो को,
रस्ते आसां है नहीं आज हम दो,
तू मेरी बाँहों में,मैं तेरी बाँहों में,
लहराएँ बाँहों में,
हम और तुम,
तुम और हम,
खुश हैं यूँ आज मिलके,
ज़ुल्फों को खुलने दो,
साँसों को घुलने दो,
दिल से दिल मिलने दो,
दीवाने हो जाएँ,
कोहरे में खो जाएँ,
मिलकर यूँ हो जाएँ,
जैसे किसी पर्वत पर,
मिल जाएँ दो बादल,
तन्हा उड़ते-उड़ते,
हम और तुम,
तुम और हम,
खुश हैं यूँ आज मिल के,
ये हवा ये हवा ये हवा...
ये फिज़ा ये फिज़ा ये फिज़ा...
है उदास जैसे मेरा दिल मेरा दिल...
आ भी जा आ भी जा आ भी जा ...

आ कि अब तो चाँदनी भी जर्द हो चली.. हो चली..
धड़कनों की नर्म आँच सर्द हो चली..हो चली..
ढ़ल ही है रात आ के मिल आ के मिल आ के मिल ..
आ भी जा आ भी जा आ भी जा ...

राह में बिछी हुई है मेरी हर नज़र.हर नज़र..
मैं तड़प रहा हूँ और तू है बेखबर. बेखबर..
रुक रही है साँस आ के मिल.आ के मिल..आ के मिल..
आ भी जा आ भी जा आ भी जा ...
ये हवा ये हवा ये हवा...

Tuesday, 8 November 2016

चली गोरी पी से मिलन को चली,-2
नैना वावरिया ,
मन में साँवरिया,
चली गोरी पी से मिलन को चली,
डार के कजरा लट बिखरा के,
ढ़लते दिन को रात बना के,
कंगना खनकाती,
बिन्दिया चमकाती,
छम-छम डोले,सजना की गली,
चली गोरी पी से मिलन को चली,
कोमल तन है,सौ बल खाया,
हो गई बैरन अपनी ही छाया,
घूँघट खोले ना,
मुँख से बोले ना,
राह चलत सँभली-सँभली,
चली गोरी पी से मिलन को चली,
मैं जागूँ सारी रैन,
सजन तुम सो जाओ,
गीतों में छुपा लो बैन,
सजन तुम सो जाओ,
साँझ ढ़ले से भोर भए तक,
जाग के जब कटतीं हैं घड़ियाँ,
मधुर मिलन की ओस में बसकर,
खिलतीं हैं जब जीवन कलियाँ,
आज नहीं वो रैन,
सजन तुम सो जाओ,
फीकी पड़ गयी चाँद की ज्योती,
धुँधले हो गए दीप गगन के,
सो गई सुंदर सेज की कलियाँ,
सो गए खिलते भाग दुल्हन के,
खुल कर रो लेँ नैन,
सजन तुम सो जाओ,
जाग के सो गई तन की अग्नि,
बढ़ के थम गई मन की हलचल,
अपना घूँघट आप उलटकर,
खोल दी मैंने पाँव की पायल,
अब है चैन ही चैन,
सजन तुम सो जाओ,
दीवारों का जंगल जिसका आबादी है नाम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,
दीवारों के इस जंगल में भटक रहे इंसान,
अपने-अपने उलझे दामन झटक रहे इंसान,
अपनी विपदा छोड़ के आए कौन किसी के काम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,
सीने खाली आँखें सूनी, चेहरों पर हैरानी,
जितने घने हँगामें इसमें, उतनी घनी उदासी,
रातें क़ातिल सुबहें मुज़रिम,मुल्ज़िम है हर शाम,
बाहर से चुप-चुप लगता है, अंदर है कोहराम,
हाल न पूछें दर्द न बाँटे, इस जंगल के लोग,
अपना-अपना सुख है सबका,अपना-अपना सोग,
कोई नहीं जो हाथ बढ़ाकर गिरतों को ले थाम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,
बेबस को दोषी ठहराए,इस जंगल का न्याय,
सच की लाश पे कोई न रोए,झूठ को शीश नवाए,
पत्थर की इन दीवारों में पत्थर हो गए राम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,
ये जुल्फ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा,
इस रात की तक़दीर सँवर जाए तो अच्छा,
जिस तरह से थोड़ी सी मेरे साथ कटी है,
बाक़ी भी उसी तरह गुजर जाए तो अच्छा,
दुनिया की निगाहों में भला क्या है बुरा क्या,
ये बोझ अगर दिल से उतर जाए तो अच्छा,
वैसे तो तुम्हीं ने मुझे बरबाद किया है,
इल्ज़ाम किसी और के सर जाए तो अच्छा,
ये जुल्फ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा,
इस रात की तक़दीर सँवर जाए तो अच्छा
रात भी है कुछ भीगी भीगी
रात भी है कुछ भीगी भीगी,
चाँद भी है कुछ मद्धम मद्धम
तुम आओ तो आँखें खोलें
सोई हुई पायल की छम-छम
छम-छम, छम-छम, छम-छम, छम-छम .
किसको बताएँ कैसे बताएँ
आज अजब है दिल का आलम
चैन भी है कुछ हल्का-हल्का
दर्द भी है कुछ मद्धम-मद्धम
छम-छम, छम-छम, छम-छम, छम-छम .
तपते दिल पर यूं गिरती है
तेरी नज़र से प्यार की शबनम
जलते हुए जंगल पर जैसे
बरखा बरसे रुक-रुक थम-थम
छम-छम, छम-छम, छम-छम, छम-छम .
होश में थोड़ी बेहोशी है
बेहोशी में होश है कम-कम
तुझको पाने की कोशिश में
दोनों जहां से खोये गए हम
छम-छम, छम-छम, छम-छम, छम-छम
लोग औरत को फ़कत जिस्म समझ लेते हैं,
रूह भी होती है उसमें ये कहाँ सोचते हैं,
रूह भी होती है इससे उन्हें मतलब ही नहीं,
वो तो बस तन के तकाजों का कहा मानते हैं,
रूह मर जाए तो हर जिस्म है चलती हुई लाश,
इस हक़ीकत को समझते हैं, न पहचानते हैं,
कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है,
कितनी सदियों से ये कायम है गुनाहों का रिवाज़,
लोग औरत की हर एक चीख को नग्मा समझे,
वो कबीलों का जमाना हो या शहरों का समाज,
जबर से नस्ल बढ़े ज़ुल्म से तन मेल करें,
जो अमल हममें है बे-इल्म परिन्दों में नहीं,
हम जो इन्सान की तहज़ीब लिए फिरते हैं,
हम सा वहशी कोई जंगल के दरिन्दों में नहीं,
एक मैं ही नहीं क्या जानिए कितनी होंगी,
जिनको अब आईना तकने में झिझक आती है,
जिनके ख्वाबों में न सेहरे हैं न सिन्दूर न सेज,
राख ही राख है जो ज़ेहन पे मँड़लाती है,
एक बुझी रूह,लुटे जिस्म के ढ़ाचे में लिए,
सोचती हूँ कि कहाँ जा के मुकद्दर फोड़ूँ,
मैं न जिन्दा हूँ के मरने का सहारा ढ़ूँढ़ूँ,
और न मुर्दा के जीने के ग़मों से छूटूँ,
कौन बतलाएगा मुझको,किसे जाकर पूछूँ,
जिंदगी कहर के साँचों में ढ़लेगी कब तक,
कब तलक आँख न खोलेगा जमाने का ज़मीर,
जुल्म और जबर की ये रीत चलेगी कब तक,
लोग औरत को फ़कत जिस्म समझ लेते हैं,

Thursday, 3 November 2016

(महिला सशक्तिकरण को नए तेवर में पेश करती रचना ..)
इतनी नाजुक न बनो,
हाय इतनी नाजुक न बनो,
हद के अंदर हो नज़ाकत,
तो अदा होती है,
हद से बढ़ जाए तो आप,
अपनी सजा होती है,
जिस्म का बोझ उठाए,
नहीं उठता तुमसे,
जिन्दगानी का कड़ा बोझ ,
सहोगी कैसे,
तुम जो हल्की सी हवाओं में ,
लचक जाती हो,
तेज झोंकों के थपेड़ों में ,
रहोगी कैसे,
ये न समझो कि हर एक राह में ,
कलियाँ होंगी,
राह चलनी है तो काँटों में भी,
चलना होगा,
ये नया दौर है इस दौर में ,
जीने के लिए,
हुश्न को हुश्न का ,
अंदाज़ बदलना .....
मेरे दिल में आज क्या है,
तू कहे तो मैं बता दूँ,
तेरी ज़ुल्फ फिर सँवारूँ ,
तेरी माँग फिर सजा दूँ,
मुझे देवता बनाकर,
मेरी चाहतों ने पूजा,
मेरा प्यार कह रहा है ,
मैं तुझे खुदा बना दूँ,
कोई ढ़ूँढ़ने भी आए,
तो हमें न ढ़ूँढ़ पाए,
तू मुझे कहीं छुपा दे,
मैं तुझे कहीं छुपा दूँ,
मेरे बाजुओं में आकर,
तेरा दर्द चैन पाए,
तेरे गेसुओं में छुपकर ,
मैं जहाँ के ग़म भुला दूँ,
मेरे दिल में आज क्या है,
तू कहे तो मैं बता दूँ,
तेरी जुल्फ फिर सँवारूँ ,
तेरी माँग फिर सजा दूँ,
रात भर का है मेहमां अंधेरा,
किसके रोके रुका है सवेरा,
रात जितनी ही संगीन होगी,
सुबह उतनी ही रंगीन होगी,
ग़म न कर ग़र है बादल घनेरा,....
लब पे शिकवा न ला अश्क पी ले,
जिस तरह भी हो कुछ देर जी ले,
अब उखड़ने को है ग़म का डेरा,...
यूँ ही दुनिया में आकर न जाना,
सिर्फ आँसू बहाकर न जाना,
मुस्कराहट पे भी हक़ है तेरा,...
किसका रस्ता देखे,ऐ दिल ऐ सौदाई,
मीलों है खामोशी,बरसों है तनहाई,
कोई भी साया नहीं राहों में,
कोई भी आएगा नहीं बाहों में,
झूठा भी नाता नहीं चाहों में,
तू ही क्यों डूबा रहें आहों में,
कोई नहीं जो यँ ही जहाँ में,
बाँटे पीर पराई,
किसका रस्ता देखे,
ऐ दिल ऐ सौदाई,
मुझे क्या बीती हुई रातों से,
सेज नहीं चिता सही,
जो भी मिले सोना होगा,
गई जो डोरी छूट हाथों में,
लेना क्या टूटे हुए साजों से,
खुशी जहाँ माँगी तूने ,
वहीं तुझे रोना होगा,
न कोई तेरा न कोई मेरा ,
फिर किसकी याद आई,
किसका रस्ता देखे,
ऐ दिल ऐ सौदाई,
पोंछकर अश्क अपनी आँखों से,
मुस्कराओ तो कोई बात बने,
सर झुकाने से कुछ नहीं होगा,
सर उठाओ तो कोई बात बनें,
जिन्दगी भीख में नहीं मिलती,
जिन्दगी बढ़ के छीनी जाती है,
अपना हक़ संगदिल ज़माने से,
छीन पाओ तो कोई बात बने,
रंग और नस्ल जात और मज़हब,
जो भी है आदमी से कमतर है,
इस हक़ीकत को तुम भी मेरी तरह,
मान जाओ तो कोई बात बने,
नफरतों के जहान में हमको,
प्यार की बस्तियां बसानी है,
दूर रहना कोई कमाल नहीं,
पास आओ तो कोई बात बने,