दीवारों का जंगल जिसका आबादी है नाम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,
दीवारों के इस जंगल में भटक रहे इंसान,
अपने-अपने उलझे दामन झटक रहे इंसान,
अपने-अपने उलझे दामन झटक रहे इंसान,
अपनी विपदा छोड़ के आए कौन किसी के काम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,
सीने खाली आँखें सूनी, चेहरों पर हैरानी,
जितने घने हँगामें इसमें, उतनी घनी उदासी,
जितने घने हँगामें इसमें, उतनी घनी उदासी,
रातें क़ातिल सुबहें मुज़रिम,मुल्ज़िम है हर शाम,
बाहर से चुप-चुप लगता है, अंदर है कोहराम,
बाहर से चुप-चुप लगता है, अंदर है कोहराम,
हाल न पूछें दर्द न बाँटे, इस जंगल के लोग,
अपना-अपना सुख है सबका,अपना-अपना सोग,
अपना-अपना सुख है सबका,अपना-अपना सोग,
कोई नहीं जो हाथ बढ़ाकर गिरतों को ले थाम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,
बेबस को दोषी ठहराए,इस जंगल का न्याय,
सच की लाश पे कोई न रोए,झूठ को शीश नवाए,
सच की लाश पे कोई न रोए,झूठ को शीश नवाए,
पत्थर की इन दीवारों में पत्थर हो गए राम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,
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