रात के राही थक मत जाना,सुबह की मंज़िल दूर नहीं,
धरती के फैले आँगन में,पल दो पल है रात का डेरा,
ज़ुल्म का सीना चीर के देखो,झाँक रहा है नया सवेरा,
ढलता दिन मजबूर सही,चढ़ता सूरज मजबूर नही,
सदियों तक चुप रहने वाले अब अपना हक लेके रहेंगे,
जो करना है खुल के करेंगे, जो कहना है साफ कहेंगे,
जीते जी घुट-घुट कर मरना,इस युग का दस्तूर नहीं
टूटेंगी बोझिल ज़ंजीरें, जागेंगी सोई तक़दीरें
लूट पे कब तक पहरा देंगी,जंग लगी खूनी शमशीरें,
रह नहीं सकता इस दुनिया में जो सबको मंजूर नहीं,
धरती के फैले आँगन में,पल दो पल है रात का डेरा,
ज़ुल्म का सीना चीर के देखो,झाँक रहा है नया सवेरा,
ढलता दिन मजबूर सही,चढ़ता सूरज मजबूर नही,
सदियों तक चुप रहने वाले अब अपना हक लेके रहेंगे,
जो करना है खुल के करेंगे, जो कहना है साफ कहेंगे,
जीते जी घुट-घुट कर मरना,इस युग का दस्तूर नहीं
टूटेंगी बोझिल ज़ंजीरें, जागेंगी सोई तक़दीरें
लूट पे कब तक पहरा देंगी,जंग लगी खूनी शमशीरें,
रह नहीं सकता इस दुनिया में जो सबको मंजूर नहीं,
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