Friday, 11 November 2016

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते,
वरना ये रात आज के संगीन दौर की,
डस लेगी जानो-दिल को कुछ ऐसे कि जानो-दिल,
ताउम्र फिर न कोई हंसी ख़्वाब बुन सकें,
गो हमसे भागती रही ये तेज़गाम उम्र,
ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र,

जुल्फ़ों के ख़्वाब,होटों के ख़्वाब और बदन के ख़्वाब,
मेराजे-फन के ख़्वाब,कमाले-सुखन के ख़्वाब,
तहज़ीबे-जिन्दगी के,फरोगे-वतन के ख़्वाब,
जि़ंदां के ख़्वाब कूचा-ए-दारो-रसन के ख़्वाब,

ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे,
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल की असास थे,
ये ख़्वाब मर गए हैं तो बेरंग है हयात,
यूं है कि जैसे दस्ते-तहे-संग है हयात,

आओ कि कोई ख़्वाब बुने कल के वास्ते,.

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