Friday, 11 November 2016

वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

इन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढ़लकेगा,
जब दुःख के बादल पिघलेंगेजब सुख का सूरज छलकेगा,

जब अम्बर झूम के नाचेगा,जब धरती नज़्में गाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

जिस सुबह की खातिर जुग-जुग से,हम सब मर-मर कर जीते हैं,
जिस सुबह के अमृत की धुन मे हम जहर के प्याले पीते हैं,

इन भूखी-प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फरमाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं,
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इन्सानों की क़ीमत कुछ भी नहीं,

इन्सानों की इज़्ज़त जब झूठे, सिक्कों में न तौली जाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

दौलत के लिए जब औरत की अस्मत को न बेचा जाएगा,
चाहत को न कुचला जाएगा, ग़ैरत को न बेचा जाएगा,

अपनी काली करतूतों पर, जब ये दुनिया शरमाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

बीतेंगे कभी तो दिन आखिर,ये भूख के और बेकारी के,
टूटेंगे कभी तो बुत आखिर,  दौलत की इज़ारादारी के,

जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

मजबूर बुढ़ापा जब, सूनी राहों की धूल न फाँकेगा,
मासूम लड़कपन जब,गंदी गलियों में भीख न माँगेगा,

हक़ माँगनेवालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

फ़ाक़ों की चिताओं पर जिस दिन इन्सां न जलाए जाएंगे,
सीनों के दहकते दोज़ख में  अरमां न जलाए जाएंगे,

ये नरक से भी गन्दी दुनियाँ जब स्वर्ग बनाई जाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

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