Thursday, 3 November 2016

(महिला सशक्तिकरण को नए तेवर में पेश करती रचना ..)
इतनी नाजुक न बनो,
हाय इतनी नाजुक न बनो,
हद के अंदर हो नज़ाकत,
तो अदा होती है,
हद से बढ़ जाए तो आप,
अपनी सजा होती है,
जिस्म का बोझ उठाए,
नहीं उठता तुमसे,
जिन्दगानी का कड़ा बोझ ,
सहोगी कैसे,
तुम जो हल्की सी हवाओं में ,
लचक जाती हो,
तेज झोंकों के थपेड़ों में ,
रहोगी कैसे,
ये न समझो कि हर एक राह में ,
कलियाँ होंगी,
राह चलनी है तो काँटों में भी,
चलना होगा,
ये नया दौर है इस दौर में ,
जीने के लिए,
हुश्न को हुश्न का ,
अंदाज़ बदलना .....

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