Friday, 11 November 2016

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते,
वरना ये रात आज के संगीन दौर की,
डस लेगी जानो-दिल को कुछ ऐसे कि जानो-दिल,
ताउम्र फिर न कोई हंसी ख़्वाब बुन सकें,
गो हमसे भागती रही ये तेज़गाम उम्र,
ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र,

जुल्फ़ों के ख़्वाब,होटों के ख़्वाब और बदन के ख़्वाब,
मेराजे-फन के ख़्वाब,कमाले-सुखन के ख़्वाब,
तहज़ीबे-जिन्दगी के,फरोगे-वतन के ख़्वाब,
जि़ंदां के ख़्वाब कूचा-ए-दारो-रसन के ख़्वाब,

ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे,
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल की असास थे,
ये ख़्वाब मर गए हैं तो बेरंग है हयात,
यूं है कि जैसे दस्ते-तहे-संग है हयात,

आओ कि कोई ख़्वाब बुने कल के वास्ते,.
आदमी को जीना है, 
ज़हर हो कि अमृत हो मुस्करा के पीना है,

धूप भी है छाँव भी है जिन्दगी की राहों में,
जितने दुख है जितने सुख है सबको ले ले बांहों में,

ग़म उन्ही को घेरता है ग़म से जो घबराए हैं,
क्या बुरे दिन क्या भले दिन,सब गुजरते साये हैं,

मैंने माना इक अनोखा दर्द तेरे दिल में है,
वह खुशी क्यों खो रहा है,जो खुशी महफ़िल में है,
रात के राही थक मत जाना,सुबह की मंज़िल दूर नहीं,

धरती के फैले आँगन में,पल दो पल है रात का डेरा,
ज़ुल्म का सीना चीर के देखो,झाँक रहा है नया सवेरा,
ढलता दिन मजबूर सही,चढ़ता सूरज मजबूर नही,

सदियों तक चुप रहने वाले अब अपना हक लेके रहेंगे,
जो करना है खुल के करेंगे, जो कहना है साफ कहेंगे,
जीते जी घुट-घुट कर मरना,इस युग का दस्तूर नहीं

टूटेंगी बोझिल ज़ंजीरें, जागेंगी सोई तक़दीरें
लूट पे कब तक पहरा देंगी,जंग लगी खूनी शमशीरें,
रह नहीं सकता इस दुनिया में जो सबको मंजूर नहीं,
अपनी धरती पे सदियों से छाई हुई ,जुल्म और लूट की संगदिल रात है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,ये न समझो कि ये आज की बात है,

जबसे धरती बनी,जब से दुनिया बसी हम यूँ ही जिन्दगी को तरसते रहे,
मौत की आँधियाँ बनके छा तीं रहीं, आग और खूँ के बादल बरसते रहे,

तुम भी मजबूर हो हम भी मजबूर हैं,क्या करें ये बुज़ुर्गों की सौगात है,
ये समझो कि ये आज की बात है,....

हम अंधेरी गुफाओं से निकले मगर रोशनी अपने सीनों से फूटी नहीं,
हमने जंगल तो शहरों बदले मगर, हमसे जंगल की तहज़़ीब छूटी नहीं,

अपनी बदनाम इंसानियत की कसम, अपनी हैवानियत आज भी साथ है,
ये न समझो कि ये आज की बात है......


हमने सुकरात को जहर की भेंट दी,और मसीहा को सूली का तख्ता दिया,
हमने गाँधी के सीने को छलनी किया, कनेडी सा जवाँ खूँ में नहला दिया,

हर मुसीबत जो इंसान पर आई है, इस मुसीबत में इंसान का हाथ है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,

हिरोशिमा की झुलसी जमीं की कसम,नागासाकी की सुलगी फ़िजा की कसम,
जिन पे जंगल का कानून भी थूक दे, ऐटमी दौर के वो दरिन्दे हैं हम,

अपनी बढ़ती हुई नस्ल खुद फूँक दे,ऐसी बदजात अपनी ही एक जात है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,

हम तबाही के रस्ते पे इतना बढ़े,अब तबाही का रस्ता ही बाकी नही,
खूने-इंसा जहाँ स़ागरों में बँटे,इसके आगे वो महफिल वो साकी नहीं,

इस अंधेरे की इतनी ही औकात थी,इसके आगे उजालों की बारात है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,
साथी हाथ बढ़ाना,साथी हाथ बढ़ाना,
एक अकेला थक जाएगा,मिलकर बोझ उठाना,
साथी हाथ बढ़ाना,

हम मेहनत वालों ने जब भी मिलकर कदम बढ़ाया,
सागर ने रस्ता छोड़ा परवत ने शीश झुकाया,

फौलादी हैं सीने अपने फौलादी हैं बाँहें,
हम चाहें तो पैदाकर दें चट्टानों में राहें,
साथी हाथ बढ़ाना,

मेहनत अपने लेख की रेखा मेहनत से क्या डरना,
कल गैरों की खातिर की आज अपनी खातिर करना,

अपना दुख भी एक है साथी,अपना सुख भी एक,
अपनी मंज़िल सच की मंज़िल अपना रस्ता नेक,
साथी हाथ बढ़ाना,

एक से एक मिले तो क़तरा बन जाता है दरिया,
एक से एक मिले तो ज़र्रा बन जाता है सहरा,

एक से एक मिले तो राई बन सकती है परवत,
एक से एक मिले तो इंसां वश में कर ले किस्मत,
साथी हाथ बढ़ाना,

माटी से हम लाल निकालें,मोती लाएं जल से,
जो कुछ इस दुनिया में बना है बना हमारे बल से,

कब तक मेहनत के पैरों में दौलत की ज़ंजीरें ?
हाथ बढ़ाकर छीन लो अपने ख्वाबों की ताबीरे,
साथी हाथ बढ़ाना,
तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले,
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,

डरता है जमाने की निगाहों से भला क्या,
इन्साफ तेरे साथ है, इल्ज़ाम उठा ले,
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,

क्या ख़ाक वो जीना है जो अपने ही लिए हो,
खुद मिट के किसी और को मिटने से बचा ले,
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,

टूटे हुए पतवार हैं कश्ती के तो ग़म क्या,
हारी हुई बाँहों को ही पतवार बना ले,
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

इन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढ़लकेगा,
जब दुःख के बादल पिघलेंगेजब सुख का सूरज छलकेगा,

जब अम्बर झूम के नाचेगा,जब धरती नज़्में गाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

जिस सुबह की खातिर जुग-जुग से,हम सब मर-मर कर जीते हैं,
जिस सुबह के अमृत की धुन मे हम जहर के प्याले पीते हैं,

इन भूखी-प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फरमाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं,
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इन्सानों की क़ीमत कुछ भी नहीं,

इन्सानों की इज़्ज़त जब झूठे, सिक्कों में न तौली जाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

दौलत के लिए जब औरत की अस्मत को न बेचा जाएगा,
चाहत को न कुचला जाएगा, ग़ैरत को न बेचा जाएगा,

अपनी काली करतूतों पर, जब ये दुनिया शरमाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

बीतेंगे कभी तो दिन आखिर,ये भूख के और बेकारी के,
टूटेंगे कभी तो बुत आखिर,  दौलत की इज़ारादारी के,

जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

मजबूर बुढ़ापा जब, सूनी राहों की धूल न फाँकेगा,
मासूम लड़कपन जब,गंदी गलियों में भीख न माँगेगा,

हक़ माँगनेवालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

फ़ाक़ों की चिताओं पर जिस दिन इन्सां न जलाए जाएंगे,
सीनों के दहकते दोज़ख में  अरमां न जलाए जाएंगे,

ये नरक से भी गन्दी दुनियाँ जब स्वर्ग बनाई जाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,
क्या ग़म जो अँधेरी हैं रातें,
इक शमा-ए-तमन्ना साथ तो है
कुछ और सहारा हो के न हो,
हाथों में तुम्हारा हाथ तो है ।
क्या जानिए कितने दीवाने
घर फूंक तमाशा देख चुके
जिस प्यार की दुनिया दुश्मन है,
उस प्यार में कोई बात तो है ।
साहिर लुधियानवी के गीत आशावादी स्वर,भविष्य के सपने, बेहतर जीवन की प्रेरणा से भरपूर हैं। उनकी एक नज़्म 'आओ कि ख्बाब बुनें कल के वास्ते... उनके ऐसे विचार को ही प्रतिबिम्बित करती है। संघर्ष से टूटे दिलों में आशा और विश्वास की संजीवनी फूंकते हैं उनके गीत...
उन्होंने लिखा है --
'न मुंह छुपा के जिए और न सर झुका के जिए,
सितमग़रों की नज़र से नज़र मिला के जिए,
अब एक रात अग़र कम जिए तो कम ही सही,
यही बहुत है कि हम मशअलें जला के जिए,
उनका जीवन भी इस बात को प्रमाणित करता है, बात चाहे शब्दों की महत्ता को प्रतिस्थापित करने को लेकर एस. डी. बर्मन, ओ.पी. नैयर, लता मंगेशकर की नाराज़गी की रही हो या सरकार के कदमों के खिलाफ लिखने पर पाकिस्तान सरकार द्वारा उनके लिए वारंट निकलने की। वे हमेशा सच और न्याय के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।
फिल्मों में अपने बिल्कुल शुरुआती दौर में "आजादी की राह पर" सन 1948 में लिखे गए उनके गीतों में से प्रस्तुत गीत है यह --
बदल रही है जिंदगी,
बदल रही है जिंदगी |
ये उजड़ी उजड़ी बस्तियां, ये लूट की निशानियाँ,
ये अजनबी पे अजनबी के ज़ुल्म की कहानियाँ,
अब इन दुखों के भार निकल रही है जिंदगी,
बदल रही है जिंदगी ।
जमीं पे सरसराहटें, फलक पे थरथराहटें,
फिजां में गूँजतीं है एक नए जहां की आहटें
मचल रही है जिंदगी, संवर रही है जिंदगी
बदल रही है जिंदगी ।
आजादी की राह पर' जो 1948 में रिलीज हुई थी,1947 में देश आजाद हुआ था यह उस दौर का लिखा फिल्म में उनके पहले गीतों में एक है। गुलामी के बोझ से कराहता देश आजाद होकर नई उमंग और उत्साह से उठ खड़े होने को तैयार था। उसके उन्हीं भावनाओं को प्रतिबिम्बित करतीं हैं ये पंक्तियाँ...
चाँद मद्धम है, आसमा चुप है, नींद की गोद में जहाँ चुप है,

दूर वादी में दूधिया बादल,झुक के पर्वत को प्यार करते हैं,
दिल में नाकाम हसरतें लेकर, हम तेरा इंतजार करते हैं,

इन बहारों के साए में आजा,फिर मोहब्बत जवाँ रहे न रहे,
जिन्दगी तेरी नामुरादों पर, कल तलक मेहरबाँ रहे न रहे,

रोज की तरह आज भी तारे, सुबह की गर्द में ना खो जाएँ,
आ तेरे ग़म में जागती आँखें,कम से कम एक रात सो जाएँ,

चाँद मद्धम है,आसमा चुप है,नींद की गोद में जहाँ चुप है,
हम और तुम,
तुम और हम,
खुश हैं यूँ आज मिलके,
जैसे किसी संगम पर,
मिल जाएँ दो नदियाँ,
तन्हा बहते-बहते,
मुड़ के क्यों देखे पीछे चाहे कुछ भी हो,
चलते ही जाएं नई मंज़िलो को,
रस्ते आसां है नहीं आज हम दो,
तू मेरी बाँहों में,मैं तेरी बाँहों में,
लहराएँ बाँहों में,
हम और तुम,
तुम और हम,
खुश हैं यूँ आज मिलके,
ज़ुल्फों को खुलने दो,
साँसों को घुलने दो,
दिल से दिल मिलने दो,
दीवाने हो जाएँ,
कोहरे में खो जाएँ,
मिलकर यूँ हो जाएँ,
जैसे किसी पर्वत पर,
मिल जाएँ दो बादल,
तन्हा उड़ते-उड़ते,
हम और तुम,
तुम और हम,
खुश हैं यूँ आज मिल के,
ये हवा ये हवा ये हवा...
ये फिज़ा ये फिज़ा ये फिज़ा...
है उदास जैसे मेरा दिल मेरा दिल...
आ भी जा आ भी जा आ भी जा ...

आ कि अब तो चाँदनी भी जर्द हो चली.. हो चली..
धड़कनों की नर्म आँच सर्द हो चली..हो चली..
ढ़ल ही है रात आ के मिल आ के मिल आ के मिल ..
आ भी जा आ भी जा आ भी जा ...

राह में बिछी हुई है मेरी हर नज़र.हर नज़र..
मैं तड़प रहा हूँ और तू है बेखबर. बेखबर..
रुक रही है साँस आ के मिल.आ के मिल..आ के मिल..
आ भी जा आ भी जा आ भी जा ...
ये हवा ये हवा ये हवा...

Tuesday, 8 November 2016

चली गोरी पी से मिलन को चली,-2
नैना वावरिया ,
मन में साँवरिया,
चली गोरी पी से मिलन को चली,
डार के कजरा लट बिखरा के,
ढ़लते दिन को रात बना के,
कंगना खनकाती,
बिन्दिया चमकाती,
छम-छम डोले,सजना की गली,
चली गोरी पी से मिलन को चली,
कोमल तन है,सौ बल खाया,
हो गई बैरन अपनी ही छाया,
घूँघट खोले ना,
मुँख से बोले ना,
राह चलत सँभली-सँभली,
चली गोरी पी से मिलन को चली,
मैं जागूँ सारी रैन,
सजन तुम सो जाओ,
गीतों में छुपा लो बैन,
सजन तुम सो जाओ,
साँझ ढ़ले से भोर भए तक,
जाग के जब कटतीं हैं घड़ियाँ,
मधुर मिलन की ओस में बसकर,
खिलतीं हैं जब जीवन कलियाँ,
आज नहीं वो रैन,
सजन तुम सो जाओ,
फीकी पड़ गयी चाँद की ज्योती,
धुँधले हो गए दीप गगन के,
सो गई सुंदर सेज की कलियाँ,
सो गए खिलते भाग दुल्हन के,
खुल कर रो लेँ नैन,
सजन तुम सो जाओ,
जाग के सो गई तन की अग्नि,
बढ़ के थम गई मन की हलचल,
अपना घूँघट आप उलटकर,
खोल दी मैंने पाँव की पायल,
अब है चैन ही चैन,
सजन तुम सो जाओ,
दीवारों का जंगल जिसका आबादी है नाम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,
दीवारों के इस जंगल में भटक रहे इंसान,
अपने-अपने उलझे दामन झटक रहे इंसान,
अपनी विपदा छोड़ के आए कौन किसी के काम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,
सीने खाली आँखें सूनी, चेहरों पर हैरानी,
जितने घने हँगामें इसमें, उतनी घनी उदासी,
रातें क़ातिल सुबहें मुज़रिम,मुल्ज़िम है हर शाम,
बाहर से चुप-चुप लगता है, अंदर है कोहराम,
हाल न पूछें दर्द न बाँटे, इस जंगल के लोग,
अपना-अपना सुख है सबका,अपना-अपना सोग,
कोई नहीं जो हाथ बढ़ाकर गिरतों को ले थाम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,
बेबस को दोषी ठहराए,इस जंगल का न्याय,
सच की लाश पे कोई न रोए,झूठ को शीश नवाए,
पत्थर की इन दीवारों में पत्थर हो गए राम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,
ये जुल्फ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा,
इस रात की तक़दीर सँवर जाए तो अच्छा,
जिस तरह से थोड़ी सी मेरे साथ कटी है,
बाक़ी भी उसी तरह गुजर जाए तो अच्छा,
दुनिया की निगाहों में भला क्या है बुरा क्या,
ये बोझ अगर दिल से उतर जाए तो अच्छा,
वैसे तो तुम्हीं ने मुझे बरबाद किया है,
इल्ज़ाम किसी और के सर जाए तो अच्छा,
ये जुल्फ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा,
इस रात की तक़दीर सँवर जाए तो अच्छा
रात भी है कुछ भीगी भीगी
रात भी है कुछ भीगी भीगी,
चाँद भी है कुछ मद्धम मद्धम
तुम आओ तो आँखें खोलें
सोई हुई पायल की छम-छम
छम-छम, छम-छम, छम-छम, छम-छम .
किसको बताएँ कैसे बताएँ
आज अजब है दिल का आलम
चैन भी है कुछ हल्का-हल्का
दर्द भी है कुछ मद्धम-मद्धम
छम-छम, छम-छम, छम-छम, छम-छम .
तपते दिल पर यूं गिरती है
तेरी नज़र से प्यार की शबनम
जलते हुए जंगल पर जैसे
बरखा बरसे रुक-रुक थम-थम
छम-छम, छम-छम, छम-छम, छम-छम .
होश में थोड़ी बेहोशी है
बेहोशी में होश है कम-कम
तुझको पाने की कोशिश में
दोनों जहां से खोये गए हम
छम-छम, छम-छम, छम-छम, छम-छम
लोग औरत को फ़कत जिस्म समझ लेते हैं,
रूह भी होती है उसमें ये कहाँ सोचते हैं,
रूह भी होती है इससे उन्हें मतलब ही नहीं,
वो तो बस तन के तकाजों का कहा मानते हैं,
रूह मर जाए तो हर जिस्म है चलती हुई लाश,
इस हक़ीकत को समझते हैं, न पहचानते हैं,
कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है,
कितनी सदियों से ये कायम है गुनाहों का रिवाज़,
लोग औरत की हर एक चीख को नग्मा समझे,
वो कबीलों का जमाना हो या शहरों का समाज,
जबर से नस्ल बढ़े ज़ुल्म से तन मेल करें,
जो अमल हममें है बे-इल्म परिन्दों में नहीं,
हम जो इन्सान की तहज़ीब लिए फिरते हैं,
हम सा वहशी कोई जंगल के दरिन्दों में नहीं,
एक मैं ही नहीं क्या जानिए कितनी होंगी,
जिनको अब आईना तकने में झिझक आती है,
जिनके ख्वाबों में न सेहरे हैं न सिन्दूर न सेज,
राख ही राख है जो ज़ेहन पे मँड़लाती है,
एक बुझी रूह,लुटे जिस्म के ढ़ाचे में लिए,
सोचती हूँ कि कहाँ जा के मुकद्दर फोड़ूँ,
मैं न जिन्दा हूँ के मरने का सहारा ढ़ूँढ़ूँ,
और न मुर्दा के जीने के ग़मों से छूटूँ,
कौन बतलाएगा मुझको,किसे जाकर पूछूँ,
जिंदगी कहर के साँचों में ढ़लेगी कब तक,
कब तलक आँख न खोलेगा जमाने का ज़मीर,
जुल्म और जबर की ये रीत चलेगी कब तक,
लोग औरत को फ़कत जिस्म समझ लेते हैं,

Thursday, 3 November 2016

(महिला सशक्तिकरण को नए तेवर में पेश करती रचना ..)
इतनी नाजुक न बनो,
हाय इतनी नाजुक न बनो,
हद के अंदर हो नज़ाकत,
तो अदा होती है,
हद से बढ़ जाए तो आप,
अपनी सजा होती है,
जिस्म का बोझ उठाए,
नहीं उठता तुमसे,
जिन्दगानी का कड़ा बोझ ,
सहोगी कैसे,
तुम जो हल्की सी हवाओं में ,
लचक जाती हो,
तेज झोंकों के थपेड़ों में ,
रहोगी कैसे,
ये न समझो कि हर एक राह में ,
कलियाँ होंगी,
राह चलनी है तो काँटों में भी,
चलना होगा,
ये नया दौर है इस दौर में ,
जीने के लिए,
हुश्न को हुश्न का ,
अंदाज़ बदलना .....
मेरे दिल में आज क्या है,
तू कहे तो मैं बता दूँ,
तेरी ज़ुल्फ फिर सँवारूँ ,
तेरी माँग फिर सजा दूँ,
मुझे देवता बनाकर,
मेरी चाहतों ने पूजा,
मेरा प्यार कह रहा है ,
मैं तुझे खुदा बना दूँ,
कोई ढ़ूँढ़ने भी आए,
तो हमें न ढ़ूँढ़ पाए,
तू मुझे कहीं छुपा दे,
मैं तुझे कहीं छुपा दूँ,
मेरे बाजुओं में आकर,
तेरा दर्द चैन पाए,
तेरे गेसुओं में छुपकर ,
मैं जहाँ के ग़म भुला दूँ,
मेरे दिल में आज क्या है,
तू कहे तो मैं बता दूँ,
तेरी जुल्फ फिर सँवारूँ ,
तेरी माँग फिर सजा दूँ,
रात भर का है मेहमां अंधेरा,
किसके रोके रुका है सवेरा,
रात जितनी ही संगीन होगी,
सुबह उतनी ही रंगीन होगी,
ग़म न कर ग़र है बादल घनेरा,....
लब पे शिकवा न ला अश्क पी ले,
जिस तरह भी हो कुछ देर जी ले,
अब उखड़ने को है ग़म का डेरा,...
यूँ ही दुनिया में आकर न जाना,
सिर्फ आँसू बहाकर न जाना,
मुस्कराहट पे भी हक़ है तेरा,...
किसका रस्ता देखे,ऐ दिल ऐ सौदाई,
मीलों है खामोशी,बरसों है तनहाई,
कोई भी साया नहीं राहों में,
कोई भी आएगा नहीं बाहों में,
झूठा भी नाता नहीं चाहों में,
तू ही क्यों डूबा रहें आहों में,
कोई नहीं जो यँ ही जहाँ में,
बाँटे पीर पराई,
किसका रस्ता देखे,
ऐ दिल ऐ सौदाई,
मुझे क्या बीती हुई रातों से,
सेज नहीं चिता सही,
जो भी मिले सोना होगा,
गई जो डोरी छूट हाथों में,
लेना क्या टूटे हुए साजों से,
खुशी जहाँ माँगी तूने ,
वहीं तुझे रोना होगा,
न कोई तेरा न कोई मेरा ,
फिर किसकी याद आई,
किसका रस्ता देखे,
ऐ दिल ऐ सौदाई,
पोंछकर अश्क अपनी आँखों से,
मुस्कराओ तो कोई बात बने,
सर झुकाने से कुछ नहीं होगा,
सर उठाओ तो कोई बात बनें,
जिन्दगी भीख में नहीं मिलती,
जिन्दगी बढ़ के छीनी जाती है,
अपना हक़ संगदिल ज़माने से,
छीन पाओ तो कोई बात बने,
रंग और नस्ल जात और मज़हब,
जो भी है आदमी से कमतर है,
इस हक़ीकत को तुम भी मेरी तरह,
मान जाओ तो कोई बात बने,
नफरतों के जहान में हमको,
प्यार की बस्तियां बसानी है,
दूर रहना कोई कमाल नहीं,
पास आओ तो कोई बात बने,
हर वक्त तेरे हुश्न का होता है समां और,
हर वक्त मुझे चाहिए अन्दाज़े-बयां और,

फूलों सा कभी नर्म तो शोलों सा कभी गर्म,
मस्ताना अदा में,कभी शोखी है कभी शर्म,

हर सुबह गुमां और है, हर रात गुमां और,
हर वक्त तेरे हुश्न का होता है समां और,

भरने नहीं पातीं तेरे जल्वों से निगाहें,
थकने नहीं पातीं तुझे लिपटा के ये बाँहें,

छू लेने से होता है तेरा जिस्म जवां और,
हर वक्त तेरे हुश्न का होता है समां और,
मुल्क में बच्चों की ग़र सरकार हो,
जिन्दगी एक ज़श्न एक त्योहार हो,
हुक्म दें ऐसे कैलेण्डर के लिए,
जिसमें दो दिन बाद एक इतवार हो,
सबको दें स्कूल जैसा यूनीफार्म,
एक सी हर पैंट हर शलवार हो,
हॉस्टल तामीर हों सबके लिए,
कोई भी इंसां न बेघरवार हो,
राष्ट्रभाषा हम इशारों को बनाएं,
दक्खिन उत्तर में न फिर तकरार हो,
हम मिनिस्टर हों तो वो सिस्टम बनें,
जिसमें मुफ़लिस हो न साहूकार हो,
क़ौमी दौलत से खजाने हो भरे,
खुद ही ले ले जिसको जो दरकार हो,
ईद दीवाली सभी मिल के मनाएं,
आदमी को आदमी से प्यार हो,
मुल्क में बच्चों की ग़र सरकार हो,
जिन्दगी एक ज़श्न एक त्योहार हो,
सुनो गज़र क्या गाए,समय गुजरता जाए,
ओ रे जीने वाले,ओ रे भोले भाले,
सोना ना..खोना ना..
गिने चुने पल हैं, तेरे जीवन के,
धूम मचा अभी,दिन हैं मिलन के,
ओ रे जीने वाले,ओ रे भोले भाले,
सोना ना..खोना ना..
हुश्न भी फ़ानी और इश्क भी फानी है,
हँस के बिता ले दो घड़ी की जवानी है,
ओ रे जीने वाले,ओ रे भोले भाले,
सोना ना..खोना ना..
बिछड़ा जमाना कभी हाथ न आएगा,
दोष न देना मुझे फिर पछताएगा,
ओ रे जीने वाले,ओ रे भोले भाले,
"मुहब्बतों में है दोनों का एक ही मतलब,
अदा से न कहो या मुस्कुरा के हाँ कह दो"
सन 1980 में रिलीज हुई सामाजिक मुद्दो पर बनी बी. आर. चोपड़ा की बेहद मकबूल हुई फिल्म "इंसाफ का तराजू" में साहिर का सदाबहार दोगाना---
हज़ार ख्वाब हकीकत का रूप ले लेंगे
मगर ये शर्त है के तुम मुस्कुरा के हाँ कह दो ।

मुहब्बतों में है दोनों का एक ही मतलब
अदा से न कहो या मुस्कुरा के हाँ कह दो ।

हज़ार ख्वाब बहारों के और सितारों के
तुम्हारे साथ मेरी जिंदगी में आये हैं, 

तुम्हारी बाहों के झूले में झूलने के लिए
मचल-मचल के मेरे अंग गुनगुनाये हैं 

ये सारे शौक, सारे शौक, सदाक़त का रूप ले लेंगे
मगर ये शर्त है के तुम मुस्कुरा के हाँ कह दो ।

भरेगी मांग तुम्हारी वो दिन भी क्या होगा
सजेगी सेज हवाओं की सांस महकेगी
तुम अपने हाथों से सरकाओगे मेरा आँचल
अजब आग मेरे तन बदन में दहकेगी

ये सारे शौक, सारे शौक, सदाक़त का रूप ले लेंगे
मगर ये शर्त है के तुम मुस्कुरा के हाँ कह दो ।

मैं अपनी जुल्फों के साये बिछाऊंगी तुम पर
मैं तुमपे अपनी जवान धड़कने लुटाऊंगा
मैं सुबह तुमको जगाऊंगी लब पे लब रखकर
मैं तुमको भींच के कुछ और पास लाऊंगा

ये सारे शौक, सारे शौक, सदाक़त का रूप ले लेंगे
मगर ये शर्त है के तुम मुस्कुरा के हाँ कह दो ।

मुहब्बतों में है दोनों का एक ही मतलब
अदा से न कहो या मुस्कुरा के हाँ कह दो
हज़ार ख्वाब हकीकत का रूप ले लेंगे ।
तोरा मनवा क्यों घबराए रे,
लाखों दीन दुखियारे प्रानी,जग में मुक्ति पाएँ रे,
राम जी के द्वार रे,
बन्द हुआ ये द्वार कभी ना,
जुग कितने ही-2 बीते,
सब द्वारों पर हारने वाले,
इस द्वारे पर-2 जीते,
लाखों पतित लाखों पतिताएँ,
पावन होकर आए रे,
रामजी के द्वार से,
तोरा मनवा क्यों घबराए रे,
लाखों दीन दुखियारे प्रानी,जग में मुक्ति पाएँ रे,
राम जी के द्वार रे,
हम मूरख जो काज बिगारें,
राम वे काज सँवारें,
वो महानंदा हो कि अहल्या,
सबको पार उतारें,
जो कंकर चरनों को छूले-2,
वो हीरा हो जाए रे,
राम जी के द्वार से,
तोरा मनवा क्यों घबराए रे,
लाखों दीन दुखियारे प्रानी,जग में मुक्ति पाएँ रे,
राम जी के द्वार रे,
मेरे रोम-रोम में बसने वाले राम,
जगत के स्वामी ओ अंतर्यामी,
मैं तुझसे क्या माँगू,
मैं तुझसे क्या माँगू,
आस का बंधन तोड़ चुकी हूँ,
सबकुछ तुझ पर छोड़ चुकी हूँ,
नाथ मेरे मैं क्यों कुछ सोचूँ,
तू जाने तेरा काम,
जगत के स्वामी ओ अंतर्यामी,
मैं तुझसे क्या माँगू,
मैं तुझसे क्या माँगू,
तेरे चरण की धूल जो पाए,
वो कंकर हीरा बन जाए,
माँग लिया जो मैंने पाया,
इन चरणों में धाम,
जगत के स्वामी ओ अंतर्यामी,
मैं तुझसे क्या माँगू,
मैं तुझसे क्या माँगू,
भेद तेरा कोई क्या पहचाने,
जो तुझसा हो,वो तुझे जाने,
तेरे किए को हम क्या देखें,
भले बुरे का ज्ञान,
जगत के स्वामी ओ अंतर्यामी,
मैं तुझसे क्या माँगू,
मैं तुझसे क्या माँगू,
धड़कने लगे दिल के तारों की दुनिया,
जो तुम मुस्करा दो - 2,
सँवर जाए हम बेकरारों की दुनिया,
जो तुम मुस्करा दो-2,
जो तुम मुस्करा दो बहारें हँसें,
सितारों की उजली कतारें हँसें,
जो तुम मुस्करा दो नज़ारे हँसें,
जवाँ धड़कनों के इशारे हँसें,
धड़कने लगे दिल के तारों की दुनिया,
जो तुम मुस्करा दो - 2,
हवा में ये खुश्बू की अँगड़ाइयाँ,
ये आँखों में जल्फों की परछाइयाँ,
ये मस्ती के धारे उबलते हुए,
ये सीनों में तूफां मचलते हुए,
धड़कने लगे दिल के तारों की दुनिया,
जो तुम मुस्करा दो - 2,
ये बोझल घटाएँ बरसती हुईं,
ये बेचैन रूहें तरसती हुईं,
ये साँसों से शोले निकलते हुए,
बदन आँच खाकर पिघलते हुए,
धड़कने लगे दिल के तारों की दुनिया,
जो तुम मुस्करा दो - 2,
हो के मायूस तेरे दर से सवाली न गया,
झोलियाँ भर गईं सबकी,कोई खाली न गया,
तेरे दरबार में जो भी, परेशां हो के आए,
दुआएँ दे के जाए और मुरादें ले के जाए,
तू रहमत का फरिश्ता है,तू उजड़े घर बसाए,
तू रूहों का मसीहा है, तू हर ग़म को मिटाए,
अहले-दिल अहले-मोहब्बत पे इनायत है तेरी,
तूने डूबों को उबारा है, ये शोहरत है तेरी,
अनोखी शान तेरी, निराली आन तेरी,
तू मस्ती का खज़ाना,तेरा हर दिल दीवाना,
तू महबूबे-ख़ुदा है, तू हर ग़म की दवा है,
तभी तो सब कहते है,कहते है,कहते है,
हो के मायूस तेरे दर से, सवाली न गया,
झोलियाँ भर गईं सबकी,कोई खाली न गया,
जमाले-यार देखा है,जमाले-यार देखा,
रुखे-दिलदार देखा है,रुखे-दिलदार देखा,
किसी का नाज़नी जलबा सरे-दरबार देखा,
तमन्नाओं के सहरा में, हसीं-गुलजार देखा,
जब से देखा है तुझे,दिल का अजब आलम है,
जानो-ईमा भी अगर नज़र करूँ, तो कम है,
था जो सुनने में आया, तुझे वैसा ही पाया,
तू अरमानों का साहिल,तू उम्मीदों की मंज़िल,
तू हर बिगड़ी बनाए, तू बिछड़ों को मिलाए,
तभी तो सब कहते हैं,कहते हैं,कहते हैं,
हो के मायूस तेरे दर से, सवाली न गया,
झोलियाँ भर गईं सबकी,कोई खाली न गया
मेरी सुन ले अरज वनबारी,
तेरे द्वार खड़ी दुखियारी, - 2
आर न सूझे,पार न सूझे,
अब कोई दूजा द्वार न सूझे,
कौन ठिकाने जाऊँ प्रभू जी,
छोड़ के शरन तिहारी,
तेरे द्वार खड़ी दुखियारी, - 2
मेरी सुन ले अरज वनबारी,
छिन गया मेरी आँख का मोती,
खो गई इन नैनन की ज्योती,
तेरे जगत में भटक रही हूँ,
मैं ममता की मारी,
तेरे द्वार खड़ी दुखियारी, - 2
मेरी सुन ले अरज वनबारी,
आँखों पर कई लोगों ने कई तरीकों से लिखा है। स्वय रामानंद सागर की फिल्म आँखें में साहिर का खुद का लिखा शीर्षक गीत भला कौन भूल सकता है। मगर मुझे हर बार सरल शब्दों में सन1971 में आई फिल्म 'धनवान' में साहिर का लिखा यह गीत हमेशा अच्छा लगा है। आप भी आनंद लें--
'मुहब्बत में जुबां चुप हो तो आँखें बात करतीं हैं...
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ये आँखें देख कर हम,
सारी दुनिया भूल जाते हैं
इन्हें पाने की धुन में ,
हर तमन्ना भूल जाते हैं

तुम अपनी महकी-महकी,
ज़ुल्फ़ के पेचों को कम कर दो
मुसाफ़िर इनमें गिरकर,
अपना रस्ता भूल जाते हैं

ये बाहें जब हमें अपनी,
पनाहों में बुलाती हैं
हमें अपनी क़सम हम,
हर सहारा भूल जाते हैं

तुम्हारे नर्म-ओ-नाज़ुक होंठ,
जिस दम मुस्कराते हैं
बहारें झेंपती हैं,
फूल खिलना भूल जाते हैं

बहुत कुछ तुम से कहने की,
तमन्ना दिल में रखते हैं
मगर जब सामने आते हैं,
कहना भूल जाते हैं

मुहब्बत में ज़ुबां चुप हो तो,
आँखें बात करतीं हैं
वो कह देती हैं सब बातें,
जो कहना भूल जाते हैं

चुप है धरती चुप हैं चाँद सितारे,
मेरे दिल की धड़कन,तुझको पुकारे,


खोए-खोए से ये मस्त नज़ारे,
ठहरे-ठहरे से ये रंग के धारे,


ढ़ूँढ़ रहे हैं तुझको,साथ हमारे,
चुप है धरती चुप हैं चाँद सितारे,


कोने-कोने मस्ती फैल रही है,
बाँहें बनकर हस्ती फैल रही है,


तुझ बिन डूबे दिल को कौन उभारे,
चुप है धरती चुप हैं चाँद सितारे,


निखरा-निखरा सा है चाँद का जोबन,
बिखरा-बिखरा सा है नूर का दामन,


आ जा मेरी तन्हाई के सहारे,
चुप है धरती चुप हैं चाँद सितारे,


हरिवंशराय बच्चन ने अपनी मधुशाला में लिखा -
अपने युग में सबको बेहतर,
ज्ञात हुआ अपना प्याला,
अपने युग में सबको बेहतर,
ज्ञात हुई अपनी हाला,
किंतु बुजुर्गों से जब पूछा,
एक यही उत्तर पाया,
अब न रहे वे पीनेवाले,
अब न रही वो मधुशाला,
हमेशा वर्तमान पीढ़ी आने वाली पीढ़ी को बुरा भला ही कहती रहती है। ये बिगड़ रही है, क्या जमाना आ गया है ? आदि आदि... वह छोटी है सो सुनना उनका फर्ज़ ठहरा। सुन लेती है उनका पक्षकार कोई नहीं था।
मगर यदि हम 1979 में आई फिल्म 'चंबल की कसम' में साहिर के इस गीत के बोलों को सुने तो लगेगा कि कितनी बेबाकी से उन्होंने नई पीढ़ी के पक्ष को प्रबलता से रखा है --
जो हमको नसीहत करते हैं,
वे अपना जमाना देख चुके,
हम पर भी जवानी आई है,
हम अपना जमाना क्यों छोड़ें,
मरता है कोई तो मर जाए,
हम अपना निशाना क्यों छोड़ें,
दुनिया तो हमारे सामने है,
जन्नत का पता क्या हो कि ना हो,
जन्नत में छुपी दौलत के लिए,
दुनिया का खज़ाना क्यों छोड़ें,
दिलवाले बचाएं दिल अपना ,
हम तीर चलाना क्यों छोड़ें...
अब आएँ या न आएँ इधर
पूछते चलो,
क्या चाहती है उनकी नज़र
पूछते चलो,
जो खुद को कह रहे हैं कि
मंज़िल-शनास हैं,
उनको भी क्या खबर है,
मगर पूछते चलो,
बिक गए जब तेरे लब,
तो तुझको क्या शिकवा अगर,
जिन्दगानी बाद-ओ-सागर
से बहलाई गई,
ऐ ग़म-ए-दुनियाँ तुझे
क्या इल्म तेरे वास्ते,
किन बहानों से तबीयत
राह पे लाई गई,
अब से पहले,पहले
अब से पहले तो ये ,
दिल की हालत न थी,
आज क्या हो गया,
आज क्या हो गया,
जिन्दगी दूसरों की
अमानत न थी,
आज क्या हो गया,
आज क्या हो गया
कोई देखे हमें
कोई चाहे हमें
और सराहे हमें,
ये तमन्ना,
ये ख्वाहिश,
ये हसरत थी,
आज क्या हो गया,
आज क्या हो गया
अपने अन्दाज़ पर
नाज़ करते थे हम,
हमको अपनी कसम,
ग़ैर से बात करने की
फुरसत न थी,
आज क्या हो गया,
आज क्या हो गया,
एक बुत आज क्यों कर
ख़ुदा बन गया,
मुद्दआ बन गया,
हमको तो सर झुकाने की
आदत न थी,
आज क्या हो गया,
आज क्या हो गया,
खत्म करो तहज़ीब की बातें,
बंद करो कल्चर का शोर,
सत्य अहिंसा सब बकवास,
तुम भी कातिल हम भी चोर,
कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया,
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया,
हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उनको,
क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया,
किस लिए जीते हैं हम किसके लिए जीते हैं,
बारहा ऐसे सवालात पे रोना आया,
कौन रोता है किसी और की खातिर अय दोस्त,
सबको अपनी ही किसी बात पे रोना आया,
कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया,
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया,
मतलब निकल गया है तो पहचानते नहीं,
यूँ जा रहे हैं जैसे, हमें जानते नहीं,
अपनी गरज थी जब तो लिपटना कबूल था,
बाँहों के दायरे में सिमटना कबूल था,
अब हम मना रहे हैं मगर मानते नहीं,
मतलब निकल गया है तो पहचानते नहीं,
हमने तुम्हें पसंद किया क्या बुरा किया,
रुतबा ही कुछ बुलंद किया क्या बुरा किया,
हर इक गली की खाक तो हम छानते नहीं,
मतलब निकल गया है तो पहचानते नहीं,
मुँह फेर के न जाओ हमारे क़रीब से,
मिलता है कोई चाहनेवाला नसीब से,
इस तरहा आशिकों पे कमां तानते नहीं,
मतलब निकल गया है तो पहचानते नहीं,
यूँ जा रहे हैं जैसे, हमें जानते नहीं,
मतलब निकल गया है तो पहचानते नहीं,
दर्द हमारा कोई न जाने,
अपनी ग़रज के सब हैं दीवाने,
किसके आगे रोना रोए, 
देश पराया लोग बेगाने,
दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना,
जहाँ नही चैना वहाँ नहीं रहना,
लाख यहाँ झोली फैला ले,
कुछ नही देंगे इस जग वाले,
पत्थर के दिल मोम न होंगे,
चाहे जितना नीर बहा ले,
दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना,
जहाँ नही चैना वहाँ नहीं रहना,
अपने लिए कब हैं ये मेले,
हम हैं हर एक मेले में अकेले,
क्या पाएगा उसमें रहकर,
जो दुनियाँ जीवन से खेले,
दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना,
जहाँ नही चैना वहाँ नहीं रहना,
दो दिन तुमने प्यार जताया,
दो दिन तुमसे मेल रहा,
अच्छा खासा वक्त कटा 
और अच्छा खासा खेल रहा,
अब इस खेल का जिक्र ही क्या
वक्त कटा और खेल तमाम,
मेरे साथी खाली जाम,
तुमने ढ़ूँढ़ी सुख की दौलत,
मैने पाला ग़म का रोग,
कैसे बनता कैसे निभता,
ये रिश्ता और ये संजोग,
मैने दिल को दिल से तौला,
तुमने माँगे प्यार के दाम,
मेरे साथी खाली जाम,
तुम दुनियाँ को बेहतर समझे,
मैं पागल था ख्वार हुआ,
तुमको अपनाने निकला था,
खुद से भी बेजार हुआ,
देख लिया घर फूँक तमाशा
जान लिया अपना अंजाम,
मेरे साथी खाली जाम,
तुम आबाद घरों के वासी
मैं आवारा और बदनाम,
मेरे साथी खाली जाम,
आप आए तो खयाले दिले नाशाद आया,
कितने भूले हुए जख्मों का पता याद आया,
आपके लब पे कभी अपना भी नाम आया था,
शोख नज़रों से मोहब्बत का सलाम आया था,
उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था,
आपको देख के वो अहदे- वफा याद आया,
आप आए तो खयाले दिले नाशाद आया,
रुह में जल उठे बुझती हुई यादों के दिए,
कैसे दीवाने थे हम आपको पाने के लिए,
यूँ तो कुछ कम नहीं जो आपने एहसान किए,
पर जो माँगे से न पाया वो सिला याद आया,
आप आए तो खयाले दिले नाशाद आया,
आज वो बात नहीं फिर भी कोई बात तो है,
मेरे हिस्से मे ये हल्की सी मुलाकात तो है,
ग़ैर का होके भी ये हुश्न मेरे साथ तो है,
हाय किस वक्त मुझे कब का गिला याद आया,
आप आए तो खयाले दिले नाशाद आया,
प्यार पर वश तो नहीं है मेरा,
लेकिन फिर भी,
तू बता दे कि तुझे 
प्यार करुँ या न करुँ,
तूने खुद अपने तबस्सुम से
जगाया है जिन्हें,
उन तमन्नाओं का
इज़हार करुँ या न करुँ,
तू किसी और के दामन की
कली है लेकिन,
मेरी रातें तेरी खुश्बू से
बसी रहतीं हैं,
तू कहीं भी हो तेरे फूल से
आरिज़ की कसम,
तेरी पलकें मेरी पलकों पे
झुकी रहतीं हैं,
मेरे ख्वाबों के झरोखों को सजाने वाली,
तेरे ख़्वाबों में कहीं मेरा गुजर है कि नहीं,
पूछकर अपनी निगाहों से बता दे मुझको,
मेरी रातों के मुकद्दर में सहर है कि नहीं...
तबस्सुम-मुस्कराहट,आरिज़-गाल,
क्यों कोई मुझको याद करे...मसरूफ़ ज़माना मेरे लिए क्यों वक्त अपना बर्बाद करे... मैं पल दो पल का शायर हूँ लिखने वाले साहिर वास्तव में कालजयी शायर है। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी एफ एफ पर पुराने बजने वाले प्रतिशत गीत उनके ही लिखे हुए होते हैं।

किसका रस्ता देखे, ऐ दिल! ऐ सौदाई
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किसका रस्ता देखे, ऐ दिल! ऐ सौदाई!
मीलों है खामोशी, बरसों है तन्हाई 


भूली दुनिया कभी की, तुझे भी मुझे भी
फिर क्यों आँख भर आई
किसका रस्ता देखे ...
कोई भी साया नहीं राहों में
कोई भी आएगा न बाहों में
तेरे लिए, मेरे लिए कोई नहीं रोने वाला,
झूठा भी नाता नहीं चाहों में
तू ही क्यों डूबा रहे आहों में
कोई किसी संग मरे, ऐसा नहीं होने वाला
कोई नहीं जो यूँ ही जहाँ में बाँटे पीर पराई

किसका रस्ता देखे ...

तुझे क्या बीती हुई रातों से
मुझे क्या खोई हुई बातों से
सेज नहीं, चिता सही जो भी मिले सोना होगा,
गई जो डोरी छूट हाथों से
लेना क्या छूटे हुए साथों से
खुशी जहाँ माँगी तूने, वहीं मुझे रोना होगा
न कोई तेरा, न कोई मेरा, फिर किसकी याद आई
किसका रस्ता देखे ...


( जोशीला -1973)
एक से बढ़कर एक शानदार 'तोरा मन दरपन कहलाए, मन रे तू काहे न धीर धरे, मेरे रोम रोम में बसने वाले राम , मेरी सुन ले अरज बनवारी, जैसे भजन साहिर की जादुई कलम से निसृत हुए हैं। आज सुबह की शुरुआत सन 1974 में आई फिल्म 36 घंटे के इस खूबसूरत भजन से करते हैं।
तीन लोक पर राज तिहारा 
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तीन लोक पर राज तिहारा
चार खूंट तोरा धाम रे


तू जो करे सो होय
दूजा करे न कोय
रखियो नजर श्रीराम रे


प्रभु तुमरे हाथ हजार
सदा रखियो लाज हमार
तुम हो जगत के स्वामी
हम हैं मूरख अज्ञानी
गिरने लगे तो लीजो थाम रे 

रखियो नजर श्रीराम रे

तोरी रचना सब संसार
तोरी लीला अपरम्पार
संकट को टारे तू ही
डूबे उभारे तू ही
दुखभंजन तेरो नाम रे
रखियो नजर श्रीराम रे