Thursday, 3 November 2016

मैंने देखा है कि ,
फूलों से लदी शाखों में,
तुम लचकती हुई,
यूँ मेरे करीब आई हो,
जैसे मुद्दत से यूँ ही ,
साथ रहा हो अपना,
जैसे अब की नहीं ,
बरसों की शनासाई हो,
मैंने देखा है कि गाते हुए ,
झरनों के करीब,
अपनी बेताबी-ए-जज़्बात,
कही है तुमने,
काँपते होठों से,
रुकती हुई आवाज़ के साथ,
जो मेरे दिल में थी ,
वो बात कही है तुमने,
आँच देने लगा कदमों तले ,
ये वर्फ का फर्श,
आज जाना है मोहब्बत में है ,
गरमी कितनी,
संगमरमर की तरह,
सख्त बदन में तेरे,
आ गई है मेरे छू लेने से ,
नरमी कितनी,

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