हरिवंशराय बच्चन ने अपनी मधुशाला में लिखा -
अपने युग में सबको बेहतर,
ज्ञात हुआ अपना प्याला,
ज्ञात हुआ अपना प्याला,
अपने युग में सबको बेहतर,
ज्ञात हुई अपनी हाला,
ज्ञात हुई अपनी हाला,
किंतु बुजुर्गों से जब पूछा,
एक यही उत्तर पाया,
एक यही उत्तर पाया,
अब न रहे वे पीनेवाले,
अब न रही वो मधुशाला,
अब न रही वो मधुशाला,
हमेशा वर्तमान पीढ़ी आने वाली पीढ़ी को बुरा भला ही कहती रहती है। ये बिगड़ रही है, क्या जमाना आ गया है ? आदि आदि... वह छोटी है सो सुनना उनका फर्ज़ ठहरा। सुन लेती है उनका पक्षकार कोई नहीं था।
मगर यदि हम 1979 में आई फिल्म 'चंबल की कसम' में साहिर के इस गीत के बोलों को सुने तो लगेगा कि कितनी बेबाकी से उन्होंने नई पीढ़ी के पक्ष को प्रबलता से रखा है --
मगर यदि हम 1979 में आई फिल्म 'चंबल की कसम' में साहिर के इस गीत के बोलों को सुने तो लगेगा कि कितनी बेबाकी से उन्होंने नई पीढ़ी के पक्ष को प्रबलता से रखा है --
जो हमको नसीहत करते हैं,
वे अपना जमाना देख चुके,
वे अपना जमाना देख चुके,
हम पर भी जवानी आई है,
हम अपना जमाना क्यों छोड़ें,
हम अपना जमाना क्यों छोड़ें,
मरता है कोई तो मर जाए,
हम अपना निशाना क्यों छोड़ें,
हम अपना निशाना क्यों छोड़ें,
दुनिया तो हमारे सामने है,
जन्नत का पता क्या हो कि ना हो,
जन्नत का पता क्या हो कि ना हो,
जन्नत में छुपी दौलत के लिए,
दुनिया का खज़ाना क्यों छोड़ें,
दुनिया का खज़ाना क्यों छोड़ें,
दिलवाले बचाएं दिल अपना ,
हम तीर चलाना क्यों छोड़ें...
हम तीर चलाना क्यों छोड़ें...
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