Thursday, 3 November 2016

आँखों पर कई लोगों ने कई तरीकों से लिखा है। स्वय रामानंद सागर की फिल्म आँखें में साहिर का खुद का लिखा शीर्षक गीत भला कौन भूल सकता है। मगर मुझे हर बार सरल शब्दों में सन1971 में आई फिल्म 'धनवान' में साहिर का लिखा यह गीत हमेशा अच्छा लगा है। आप भी आनंद लें--
'मुहब्बत में जुबां चुप हो तो आँखें बात करतीं हैं...
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ये आँखें देख कर हम,
सारी दुनिया भूल जाते हैं
इन्हें पाने की धुन में ,
हर तमन्ना भूल जाते हैं

तुम अपनी महकी-महकी,
ज़ुल्फ़ के पेचों को कम कर दो
मुसाफ़िर इनमें गिरकर,
अपना रस्ता भूल जाते हैं

ये बाहें जब हमें अपनी,
पनाहों में बुलाती हैं
हमें अपनी क़सम हम,
हर सहारा भूल जाते हैं

तुम्हारे नर्म-ओ-नाज़ुक होंठ,
जिस दम मुस्कराते हैं
बहारें झेंपती हैं,
फूल खिलना भूल जाते हैं

बहुत कुछ तुम से कहने की,
तमन्ना दिल में रखते हैं
मगर जब सामने आते हैं,
कहना भूल जाते हैं

मुहब्बत में ज़ुबां चुप हो तो,
आँखें बात करतीं हैं
वो कह देती हैं सब बातें,
जो कहना भूल जाते हैं

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