"प्रकृति परमात्मा का दृश्य रूप है"
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ओशो कहते हैं - प्रकृति ही अदृश्य होते - होते परमात्मा हो गई है। प्रकृति परमात्मा का दृश्य रूप है। क्या आपको कभी ऐसी अनुभूति प्रकृति के सानिध्य में जाकर नहीं हुई हैं ? क्या कभी आपका मन किया कि सारी दुनिया के जंजाल छोड़कर प्रकृति की इस हरी भरी गोद में, इस रमणीक वातावरण में समय बिताया जाए।
नीले गगन के तले, पर्वतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है,ये रात ये चाँदनी फिर कहाँ, ओ नीले पर्वतों की धारा,पड़ गए झूले सावन ऋतु आई रे, ये वादियाँ ये फिजाएँ बुला रही हैं तुम्हें, जैसे गीत लिखने वाले साहिर के बाद ऐसे गीतों की धारा रुक सी गई है। आइए 'मन की आँखें' फिल्म में लिखे उनके एक खूबसूरत प्रकृति गीत का आनंद लें।
नीले गगन के तले, पर्वतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है,ये रात ये चाँदनी फिर कहाँ, ओ नीले पर्वतों की धारा,पड़ गए झूले सावन ऋतु आई रे, ये वादियाँ ये फिजाएँ बुला रही हैं तुम्हें, जैसे गीत लिखने वाले साहिर के बाद ऐसे गीतों की धारा रुक सी गई है। आइए 'मन की आँखें' फिल्म में लिखे उनके एक खूबसूरत प्रकृति गीत का आनंद लें।
दिल कहे रुक जा रे रुक जा, यहीं पे कहीं,
जो बात इस जगह हैं कहीं पर नहीं,
जो बात इस जगह हैं कहीं पर नहीं,
परबत ऊपर खिड़की खोले,
झाँके सुंदर भोर,
चले पवन सुहानी
नदियों के यह राग रसीले,
झरनों का ये शोर,
बहे झर - झर पानी,
मदभरा, मदभरा समा,
वन धुला धुला,
हर कली सुख पली यहाँ,
रस घुला घुला,
झाँके सुंदर भोर,
चले पवन सुहानी
नदियों के यह राग रसीले,
झरनों का ये शोर,
बहे झर - झर पानी,
मदभरा, मदभरा समा,
वन धुला धुला,
हर कली सुख पली यहाँ,
रस घुला घुला,
तो दिल कहे रुक जा रे रुक जा...
नीली नीली झील में झलके,
नील गगन का रूप,
बहे रंग के धारे
ऊँचे- ऊँचे पेड़ घनेरे,
छनती जिनसे धूप,
खडे बाँह पसारे,
चंपई चंपई फ़िज़ा,
दिन खिला - खिला
डाली - डाली चिड़ियों की सदा,
सुर मिला - मिला,
नील गगन का रूप,
बहे रंग के धारे
ऊँचे- ऊँचे पेड़ घनेरे,
छनती जिनसे धूप,
खडे बाँह पसारे,
चंपई चंपई फ़िज़ा,
दिन खिला - खिला
डाली - डाली चिड़ियों की सदा,
सुर मिला - मिला,
तो दिल कहे रुक जा रे रुक...
परियों के यह जमघट जिनके
फूलों जैसे गाल,
सभी शोख हठीली
इनमें हैं वो अल्हड़
जिसकी हिरनी जैसी चाल,
बड़ी छैल - छबीली
मनचली- मनचली अदा,
छब जवाँ - जवाँ,
हर घड़ी चढ़ा रहा नशा,
सुध रही कहाँ
फूलों जैसे गाल,
सभी शोख हठीली
इनमें हैं वो अल्हड़
जिसकी हिरनी जैसी चाल,
बड़ी छैल - छबीली
मनचली- मनचली अदा,
छब जवाँ - जवाँ,
हर घड़ी चढ़ा रहा नशा,
सुध रही कहाँ
तो दिल कहे रुक जा रे रुक जा
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