तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक़ है तुमको
मेरी बात और है मैंने तो मुहब्बत की है !
मेरी बात और है मैंने तो मुहब्बत की है !
साहिर लुधियानवी के बगैर न उर्दू शायरी का इतिहास लिखा जाना मुमक़िन है, न हिंदी और उर्दू फ़िल्मी गीतों का। शब्दों और संवेदनाओं के जादूगर साहिर के सीधे-सच्चे लफ़्ज़ों में कुछ ऐसा है जो सीधे दिल की गहराईयों में उतर जाता है। प्रगतिशील चेतना के इस शायर ने जीवन के यथार्थ और कुरूपताओं से बार-बार टकराने के बावजूद शायरी के बुनियादी स्वभाव कोमलता और नाज़ुकबयानी का दामन कभी नहीं छोड़ा। ग़ज़लों और नज़्मों की भीड़ में भी उनकी रचनाओं को एकदम अलग से पहचाना जा सकता है।
कैफ़ी आज़मी, शकील बदायूंनी और मज़रूह सुल्तानपुरी की तरह ही वे उर्दू अदब के साथ हिंदी-उर्दू सिनेमा के बेहद लोकप्रिय गीतकार रहे।
धर्मपुत्र, मुनीम जी, जाल, पेइंग गेस्ट, फंटूश, प्यासा, वक़्त, धूल का फूल, हम हिंदुस्तानी, सोने की चिड़िया, फिर सुबह होगी, टैक्सी ड्राइवर, साधना, देवदास, ताजमहल, मुझे जीने दो, हम दोनों, प्यासा, बरसात की रात, नया दौर, दिल ही तो है, गुमराह, शगुन, चित्रलेखा, काजल, हमराज़, नीलकमल, दाग, दो कलियां, इज्ज़त, आंखें, बहू बेगम, लैला मज़नू, कभी कभी आदि फिल्मों के लिए लिखे उनके कालजयी गीत कभी भुलाये न जा सकेंगे। साहिर का व्यक्तिगत जीवन बेहद उदास और अकेला रहा। अपने से उम्र में बहुत बड़ी विख्यात पंजाबी लेखिका अमृता प्रीतम से बहुत गहरे, लेकिन असफल प्रेम-संबंध के बाद उन्होंने आजीवन अविवाहित रहना पसंद किया।
पुण्यतिथि (25 अक्टूबर) पर इस महान शायर को खेराज़-ए-अक़ीदत, फिल्म 'फिर सुबह होगी' की उनकी एक कालजयी नज़्म की कुछ पंक्तियों के साथ !
कैफ़ी आज़मी, शकील बदायूंनी और मज़रूह सुल्तानपुरी की तरह ही वे उर्दू अदब के साथ हिंदी-उर्दू सिनेमा के बेहद लोकप्रिय गीतकार रहे।
धर्मपुत्र, मुनीम जी, जाल, पेइंग गेस्ट, फंटूश, प्यासा, वक़्त, धूल का फूल, हम हिंदुस्तानी, सोने की चिड़िया, फिर सुबह होगी, टैक्सी ड्राइवर, साधना, देवदास, ताजमहल, मुझे जीने दो, हम दोनों, प्यासा, बरसात की रात, नया दौर, दिल ही तो है, गुमराह, शगुन, चित्रलेखा, काजल, हमराज़, नीलकमल, दाग, दो कलियां, इज्ज़त, आंखें, बहू बेगम, लैला मज़नू, कभी कभी आदि फिल्मों के लिए लिखे उनके कालजयी गीत कभी भुलाये न जा सकेंगे। साहिर का व्यक्तिगत जीवन बेहद उदास और अकेला रहा। अपने से उम्र में बहुत बड़ी विख्यात पंजाबी लेखिका अमृता प्रीतम से बहुत गहरे, लेकिन असफल प्रेम-संबंध के बाद उन्होंने आजीवन अविवाहित रहना पसंद किया।
पुण्यतिथि (25 अक्टूबर) पर इस महान शायर को खेराज़-ए-अक़ीदत, फिल्म 'फिर सुबह होगी' की उनकी एक कालजयी नज़्म की कुछ पंक्तियों के साथ !
वो सुबह कभी तो आएगी
इन काली सदियों के सर से
जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे
जब सुख का सागर झलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा,
जब धरती नगमे गाएगी
इन काली सदियों के सर से
जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे
जब सुख का सागर झलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा,
जब धरती नगमे गाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
माना कि अभी तेरे-मेरेे
अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर
इंसानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब
झूठे सिक्कों में न तोली जाएगी
माना कि अभी तेरे-मेरेे
अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर
इंसानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब
झूठे सिक्कों में न तोली जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
मजबूर बुढ़ापा जब सूनी
राहों की धूल न फांकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी
गलियों में भीख न मांगेगा
हक़ मांगने वालों को जिस दिन
सूली न दिखाई जाएगी
राहों की धूल न फांकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी
गलियों में भीख न मांगेगा
हक़ मांगने वालों को जिस दिन
सूली न दिखाई जाएगी
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