Thursday, 3 November 2016

मेरे रोम-रोम में बसने वाले राम,
जगत के स्वामी ओ अंतर्यामी,
मैं तुझसे क्या माँगू,
मैं तुझसे क्या माँगू,
आस का बंधन तोड़ चुकी हूँ,
सबकुछ तुझ पर छोड़ चुकी हूँ,
नाथ मेरे मैं क्यों कुछ सोचूँ,
तू जाने तेरा काम,
जगत के स्वामी ओ अंतर्यामी,
मैं तुझसे क्या माँगू,
मैं तुझसे क्या माँगू,
तेरे चरण की धूल जो पाए,
वो कंकर हीरा बन जाए,
माँग लिया जो मैंने पाया,
इन चरणों में धाम,
जगत के स्वामी ओ अंतर्यामी,
मैं तुझसे क्या माँगू,
मैं तुझसे क्या माँगू,
भेद तेरा कोई क्या पहचाने,
जो तुझसा हो,वो तुझे जाने,
तेरे किए को हम क्या देखें,
भले बुरे का ज्ञान,
जगत के स्वामी ओ अंतर्यामी,
मैं तुझसे क्या माँगू,
मैं तुझसे क्या माँगू,

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